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मेरे अल्फाज़

उम्मीद जगा बैठी हूं।

Sujeet Mishra

335 कविताएं

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तेरे आने की उम्मीद जगा बैठी हूं।
घर आंगन ये गलियां सजा के बैठी हूं।।
होके पागल सी ,हंसती फिरती हूं घर भर में ।
जैसे अंगारे बदन में लगा के बैठी हूं।।
मेरा क्या मैं तो बहर हाल जी रही मर मरकर ।
अपने सीने में तेरा दिल सम्भाले बैठी हूं।।
तेरे आने की उम्मीद जगा बैठी हूं।।

सुजीत कुमार मिश्रा
प्रयागराज।

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