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मेरे अल्फाज़

विदाई गीत

SUNIL KUMAR SHARMA

1 कविता

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सब जाते हैं चले ,
एक दिन अचानक
यूं ही तुम भी चले जाओगे ।
कहते थे,
हो जाओगे विलीन
उस अंतहीन अनंत में ।
कल्पनाओं के प्रदेश में ,
अभिलाषाओं के गर्त में ,
व्यथाओं के गहरे पानी में,
हूक की लहरे उठ रही
सूनामी सी बनकर
और हार जाएंगी ।
पर ढूंढ नहीं पायेंगी ।

ना कोई पद्चाप,
यूं ही चुपचाप,
बिना खांसे खंखारे
फ़ुर्र उड़ गये ।
ये कैसा व्यवहार,
ना क्षण भर भी विचार
राग बैराग बंधनों के तार
तोड़ अचानक ही चले गये ।
खोज रहा बैठ कर
हो भ्रमित, गूगल में
क्या करने होंगे लोकाचार,
पिता की स्मृति में ।
संवेदनाएं व्यक्त हो रही
और कुछ दिन अभिव्यक्त्त होंगी
भावावेश में ।
सार अर्थ टिप्पणियां
अध्यात्म पथ पर
लिख रहे थे जो
यूं ही आधी-अधूरी छोड़ जाओगे ?
पिछले वर्ष जो बोये थे
बीज तुमने वो
बन तरु गुनगुनायेंगे
चले गये थे, एक दिन निर्मोही
बिना फलों की प्रतीक्षा किये ।
स्मृति गुहाओं में
यादों के नेतृत्व में
मुस्काते आओगे
और फिर रेत की तरह
फिसल जाओगे ।
सृजनकर्ता के
सृजन का कैसा ये पड़ाव ?
प्रश्न प्यासा ही
छोड़ जाओगे ।
और बस फिर दोहराएंगे
कहते थे अचानक एक दिन
यूं ही चले जाओगे ।

© डॉ सुनील कुमार शर्मा


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