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मेरे अल्फाज़

तेरी सुरमई आंखों के ...

Suryakant Bharati

4 कविताएं

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तेरी सुरमई आंखों के हवाले हो गया ,
तेरे टोके से जो ठहरा तो सवाले हो गया ।

इक लोच है तेरी झुकती उठ़ती निगाह में ,
जरा जरा सी चोट से दिल घायल हो गया ।

नतमस्तक ही रहूं तेरे आगे और तेरे पीछे ,
मेरे लिए तेरा समूचा बदन शिवाला हो गया ।

इंतजार की हद तक तुम्हें निहारने के लिए ,
अपने ही बेशकीमती वक्त के निवाले हो गया ।

अब के तुम आई हो कई रातें गुजरने के बाद ,
तेरे आने भर से ही मेरे घर में उजाले हो गया ।

- सूर्यकांत भारती

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