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मेरे अल्फाज़

बोलते उदास शब्द

Vikas Chauhan

3 कविताएं

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दरवाजे करो बन्द
कि ये अंदर आ रही है
आँधिया शरारती है
बार-बार घर का दीया बुझा रही है।

आंखे मिलेंगी
तभी तो होगा इश्क़
वो इतनी शर्मीली है कि
बार-बार नज़रे झुका रही है।

हवाएं चलने लगी तेज़
आग को ये और बढ़ा रही है
मैं उसके आगे से गुजर गया
वो बार-बार मुड़कर देखे जा रही है।

सुराख कर बैठे खुद की कश्ती में
तभी पराई लहरे इसे डूबा रही है
करके जुदा मछलियो को समंदर से
दुनिया अब इन्हें तैरना सीखा रही है।


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