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मेरे अल्फाज़

कहां गए कान्हा

VIVEK RAJ RASTOGI

6 कविताएं

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छोड़कर गए जो कान्हा तुम हमें अकेला
मिट्टी में मिल रहे हैं पांडव |
शान से दुर्योधन , दुःशासशन जीते हैं ||
करोड़ो औलादे है धृतराष्ट्र की |
हर घर में एक शकुनि रहता है ||
बिक रहा है चहु ओर झूठ |
सच को चुप रहने की आदत है ||
छोड़कर गए जो तुम कान्हा |
शहरों में अब कंस ही शासित हैं ||

छोड़कर गए जो कान्हा तुम हमें अकेला
बांसुरी जैसी मधुर धुनें शोर में दबी है |
द्रौपदी तो बाज़ारों में बेइज़्ज़त होती हैं ||
राधा जैसा प्रेम अब तन से मिलता है |
मीरा जैसी भक्ति तो बिकती दिखती हैं ||
यशोदा वासुदेव को घर में जगह नहीं |
सुभद्रा को पैदा होते ही मारते फिरते हैं ||
छोड़कर गए जो तुम कान्हा |
हर तरफ अब भक्षक बसते हैं ||

छोड़कर गए जो कान्हा तुम हमें अकेला
गोकुल हो रही अब ओझल |

गोवर्धन झुक गया सा दिखता हैं ||
मथुरा संघर्ष में डूब रही है |
गौ मां का मोल भाव होता रहता हैं ||
माखनचोरी अब कोई करता नहीं चूकि |
हर घर में कौरव पैदा होते हैं ||
छोड़कर गए जो तुम कान्हा |
हर तरफ अब लूटेरे बसते हैं ||

बन के आओ फिर से मेरा सारथी, मेरा सखा
फिर से समझाओ एक बार गीता
भेदना हैं इस ११ औक्षणी सेना के चक्रव्यूह को
इस बार बस जाओ मुझमे तुम कान्हा
फिर ना जाना मुझे छोड़कर अकेला

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