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मेरे अल्फाज़

अब दिल की हसरतों में शहनाई नहीं है

Zafaruddin Zafar

168 कविताएं

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दूर तक भी खुशियों की परछाई नहीं है,
अब दिल की हसरतों में शहनाई नहीं है।

सब कुछ खो दिया ज़िन्दगी के सफ़र में,
लाख कोशिश से उसकी भरपाई नहीं है।

उसने मौत दी मुझे सारे हुक़ूक़ छीन कर,
वो एक शातिर था गोली चलवाई नहीं है।

सारे हिस्से बंट गए हैं ख़्वाबों के नींद से,
ये अलग बात कि दीवार बनवाई नहीं है।

वो मेरे ही अरमानों का क़ातिल है मगर,
उसके लहज़े में फिर भी नरमाई नहीं है।

सारा दर्द निकल जाता है आंसू बन कर,
इसलिए आंखों के पानी में काई नहीं है।

उसको खबर भी क्या दिल की चोट का,
जिस शख्स ने कभी ठोकर खाई नहीं है।

जा कर कहां करूं इस दर्द की शिकायत,
यहां अदालत में सच की सुनवाई नहीं है।

मुझे करना भी क्या है बाज़ार टहल कर,
'ज़फ़र'जेब में दौलत की गरमाई नहीं है।

- ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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