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मेरे अल्फाज़

अब मेरी ज़िन्दगी में अजूबा नहीं कोई

Zafaruddin Zafar

174 कविताएं

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अब मेरी ज़िन्दगी में अजूबा नहीं कोई,
आंसू तो बहुत हैं मगर डूबा नहीं कोई।

एक दौर था हसरतों के शहंशाह रहे हैं,
मगर आज क़िस्मत में सूबा नहीं कोई।

मैं तो ग़मों की चोट से टूटता चला गया,
मुझ पर सितम ढाने से ऊबा नहीं कोई।

ऐसा नहीं कि मेरी ज़िन्दगी सुनसान है,
दुश्मन तो बहुत हैं दिलरूबा नहीं कोई।

इसलिए रात को सोता नहीं आज कल,
अभी मेरे ख़्वाबों में मतलूबा नहीं कोई।

मैं कैसे रखूं पागल सियासत से वास्ता,
मुझे सहारा देने को महबूबा नहीं कोई।

अब चांद देखकर करना भी क्या मुझे,
ज़फ़र ईद मनाने का मंसूबा नहीं कोई।

-ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट
दिल्ली-32


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