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मेरे अल्फाज़

बहेलिये ने चारों तरफ़ फंदे डाल रखे हैं

Zafaruddin Zafar

168 कविताएं

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मुश्किल से अपने हौंसले संभाल रखे हैं,
मेरी आस्तीनों ने कई सांप पाल रखे हैं।

मेरा मन परिंदा है मगर जाए भी किधर,
बहेलिये ने चारों तरफ फंदे डाल रखे हैं।

देख लिया आसमां में छेद होता ही नहीं,
मैंने भी तबियत से पत्थर उछाल रखे हैं।

इतना मालूम नहीं सावन लौटेगा या नहीं,
मगर नादान हसरतों ने झूले डाल रखे हैं।

वो जवाबदेही तो माने तुम्हें भी बताऊंगा,
मैंने अभी अमीरे शहर से सवाल रखे हैं।

वो एक ज़माना बदर शख्सियत है मगर,
मैंने रिश्ते तमाम फिर भी बहाल रखे हैं।

तेरी मुबारक़बाद से कुछ भी नहीं हासिल,
ले जा कौने में उदास बीते साल रखे हैं।

कश्तियां भी डरती हैं समन्दर में जाने से,
तूफ़ानों ने जब से भंवर में जाल रखे हैं।

छत पर टहल कर चले जाते हैं "ज़फ़र",
नींदों ने दिल के सारे ख्वाब टाल रखे हैं।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली


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