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मेरे अल्फाज़

हमारी सरहदों पर हलचल किसलिए है

Zafaruddin Zafar

176 कविताएं

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उसकी बौखलाहट हर पल किसलिए है,
हमारी सरहदों पर हलचल किसलिए है।

अगर दुश्मनों से सुलह हो गई थी फिर,
ये राहे मंज़िलों में दलदल किसलिए है।

जाना है सब को ख़ुदा की अदालत में,
फितरत में झूठ और छल किसलिए है।

चेहरे पर परेशानी की शिकन ना लाओ,
ढूंढ लेंगे हर बात का हल किसलिए है।

बारिश को ज़मी तक आना नहीं अगर,
आसमां में दूर तक बादल किसलिए है।

मैंने हसरतों के चिराग़ भी नहीं जलाए,
फिर हवा गुस्से में पागल किसलिए है।

तुम धूप से डर कर ठहर गए सफ़र में,
मां की दुआओं का आंचल किसलिए है।

ग़ैरत तो कब की मर गई अमीरे शहर,
आंखों में झूठ का काजल किसलिए है।

रात बहुत हो गई सो जाओ ऐ 'ज़फ़र',
काम भी हो जाएगा कल किसलिए है।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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