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मेरे अल्फाज़

जब भी ज़ुल्म की तक़दीर बनी होगी

Zafaruddin Zafar

169 कविताएं

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जब भी ज़ुल्म की तक़दीर बनी होगी,
आज के ही दौर की तस्वीर बनी होगी।

उसकी फितरत सियासत से मिली होगी,
तब कहीं जाकर ये शमशीर बनी होगी।

एक उड़ता हुआ परिंदा घायल हो गया,
अमीरे शहर की नज़र तीर बनी होगी।

उसके लुटने की उसे ही खबर नहीं हुई,
कितने सोच समझकर तदबीर बनी होगी।

उसका बेटा नहीं लौटा है अभी तक भी,
कैसे उसके घर ईद की शीर बनी होगी।

आज तो रहबर भी मुंह फेरकर चले गए,
शायद सियासत पैरों की ज़ंज़ीर बनी होगी।

क़ातिल ऐसे ही नहीं घूम रहा शहर में,
ज़फ़र दौलत बरी की नज़ीर बनी होगी।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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