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मेरे अल्फाज़

जब हो गए लाल शहीद सुलह की बात नहीं करनी

Zafaruddin Zafar

176 कविताएं

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अब दुश्मन के आगे झुकने की शुरुआत नहीं करनी,
जब हो गए लाल शहीद सुलह की बात नहीं करनी।

कल युद्ध क्षेत्र में लिखेंगे तक़दीर सुनहरी अपनी भी,
उनसे सख्त़ लहज़े में कह दो मुलाक़ात नहीं करनी।

इन तूफ़ानों से डर कर हम चुपचाप नहीं रह पाएंगे,
अपने घर को रौशन रखना है कोई रात नहीं करनी।

हम कितने दरिया दिल हैं अहसास उन्हें हो जाएगा,
उनसे डट कर बदला लेना है कोई मात नहीं करनी।

आओ एक साथ मिल कर दुश्मन को मज़ा चखाएंगे,
मुल्क़ की अज़मत की ख़ातिर धर्म ज़ात नहीं करनी।

इतनी सी दुआ है कि सरहदें महफ़ूज़ रहें शैतानों से,
हमें तलवार के बल पर अपनी क़ायनात नहीं करनी।

खुशी मुक़द्दर को मिले ना मिले अलग बात है मगर,
'ज़फ़र'दबाव में आकर ग़मों की बारात नहीं करनी।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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