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मेरे अल्फाज़

जीता रहा हूँ ज़िन्दगी समझदारियों से

Zafaruddin Zafar

169 कविताएं

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जीता रहा हूँ ज़िन्दगी समझदारियों से,
वरना छूटा है कब पीछा दुश्वारियों से।

ये मुक़द्दर ने मौत को चकमा दे दिया,
उस ने मारा था ख़ंज़र होशियारियों से।

मुझे अपने समझते हैं बहुत हट्टा कट्टा,
इसलिए लड़ता हूँ अकेले बीमारियों से।

आंसू ठहर जाते हैं आंखों में आ कर,
जब भी सामना होता है लाचारियों से।

मेरी अज़मत रहती है ख़तरे में हर पल,
क्या ख़ाक़ गूंजा आंगन किलकारियों से।

मेरा दम सा घुटने लगा अपने सहन में,
हवा जो रूकी है उसकी मक्कारियों से।

बस दिल नहीं मेरा,रूह तक घायल है,
कुछ नहीं होगा इन फल तरकारियों से।

मैंने पल पल देखें हैं आस्तीन के सांप,
यूं दूर रहता हूँ मौहल्ले की यारियों से।

घटता जा रहा है मेरी बात का वज़न,
वैसे हल्का नहीं हूँ इल्म में भारियों से।

फ़ना हो जाता है मां-बाप की दुआ से,
बैशक आता है तूफ़ान बड़ी तैयारियों से।

ज़फ़र ख़ुशबू नहीं लिखी मुक़द्दर में मेरे,
मैं उम्मीद भी क्या करूं फुलवारियों से।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32

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