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मेरे अल्फाज़

झूठों का सियासत से तबादला कर दीजिए

Zafaruddin Zafar

176 कविताएं

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फिरक़ा परस्त सोच को बावला कर दीजिए,
झूठों का सियासत से तबादला कर दीजिए।

पाप हर शख्स का निचोड़ कर रख दीजिए,
पानी बेशक नदियों का ग़ादला कर दीजिए।

फिर गिन कर देखेंगे कितने चाहने वाले रहे,
तुम चांद को थोड़ा सा सांवला कर दीजिए।

तमाम रास्ते हैं टेढ़े-मेढ़े अंधेरों के साये में,
मेरे साथ रौशनी का क़ाफ़िला कर दीजिए।

सब बस्तियों में टहले इंसानियत की खुशबू,
नफरत से आदमी का फ़ासला कर दीजिए।

ऐ ज़िन्दगी मैंने कभी कुछ नहीं मांगा मगर,
जो बच गई हैं हसरतें घौसला कर दीजिए।

खुश्क क़लम को भी शौहरतें मिल जायेंगी,
उसे मेरी ग़ज़लों का उतावला कर दीजिए।

शर्त ज़रा सी है कि बीच में आए ना कोई,
मेरा जब चाहे उनसे मुक़ाबला कर दीजिए।

एक बीमार शज़र को रौनकें मिल जायेंगी,
ज़फ़र मेरे हक़ में भी मामला कर दीजिए।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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