आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   KABHI BHI TAQAT SE ZYADA GURRAHAT ACHCHHI NAHI

मेरे अल्फाज़

कभी भी ताक़त से ज़्यादा गुर्राहट अच्छी नहीं

Zafaruddin Zafar

174 कविताएं

69 Views
शानो-शौकत दिखाने में झुंझलाहट अच्छी नहीं,
कभी भी ताक़त से ज़्यादा गुर्राहट अच्छी नहीं।

अच्छे रिश्ते बना कर रखिए दोनों का भला है,
पलभर पड़ोसी मुल्क से कड़वाहट अच्छी नहीं।

ये दुआ है कि सारा वक़्त तरक्क़ी में लगे बस,
मुल्क में किसी जंग की सुगबुगाहट अच्छी नहीं।

बदला ना मिले जब तक सरहद पर शहीदों का,
ऐ सियासत तेरे चेहरे पर मुस्कराहट अच्छी नहीं।

पलभर में दुश्मन पढ़ लेगा दिल की कशमकश,
मुकर्रर वक़्त से पहले तिलमिलाहट अच्छी नहीं।

जब प्यास बोले समन्दर से आंख मिलाकर बोले,
रो रोकर सूखे दरिया में झटपटाहट अच्छी नहीं।

अब हाल ए तक़दीर जो भी होगा देखा जाएगा,
सिर ओखली में रखने पर घबराहट अच्छी नहीं।

एक मुद्दत के बाद कश्तियां उतरीं हैं समन्दर में,
सांसों के लिएं ज़लज़लों की आहट अच्छी नहीं।

'ज़फ़र'शायर की ग़ज़ल हैं आईना इस दौर का,
जो हो चुके पुराने उनकी गुनगुनाहट अच्छी नहीं।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!