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मेरे अल्फाज़

सियासत कभी फासला पाटा नहीं करती

Zafaruddin Zafar

166 कविताएं

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लोगों का एक दर्द भी सांझा नही करती,
सियासत कभी फासला पाटा नहीं करती।

तकरार अगर हो जाए दो भाईयों के बीच,
अदालत भी इंसाफ का वादा नहीं करती।

तुम्हें एक पल की फुर्सत हो ना हो मगर,
मौत तयशुदा वक़्त को टाला नहीं करती।

भारत फिर सोने की चिड़िया होता अगर,
सल्तनत अपना गड़बड़ झाला नहीं करती।

गली का बूढ़ा शज़र कट नहीं जाता अगर,
लकड़ी कुल्हाड़ी से मुंह काला नहीं करती।

क़िस्मत से बचते हैं वो दायरे को छोड़कर,
मां सांप की बच्चे कभी पाला नहीं करती।

अगर मखलूक़ को अपना खानदान मानती,
ये सरकार कभी कोई घोटाला नहीं करती।

तुम अगर हो बेखबर साईंसदां से पूंछ लो,
चांद की कोई हरक़त उजाला नहीं करती।

अगर मां बाप का दिया सलीक़ा नहीं होता,
वो दुपट्टा कभी अपना संभाला नही करती।

मुमकिन नही थी पहचान अपने पराये की,
ग़र बीमारी मज़दूरों का तमाशा नहीं करती।

फुटपाथ पर सो जाती है ठंड में सिकुड़कर,
ये मुफलिसी चादर कभी ताना नहीं करती।

मुझे फाका हो जाए कोई बात नहीं लेकिन,
मेरी ग़ैरत मेरे हाथों को कासा नही करती।

उसको बिल्कुल ना बचे अलग बात है मगर,
मां बच्चों के लिए खाना आधा नहीं करती।

जो छोड़ दिया उसकी सिफारिश ना कीजिए,
मेरी ज़िद बात किसी की माना नहीं करती।

ज़फ़र कहे ना कहे दिल में खुशी है मगर,
वो साफ ऐसे कोने का जाला नहीं करती।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32

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