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मेरे अल्फाज़

सूखे शज़र पर भी नई पत्तियां आने लगीं

Zafaruddin Zafar

167 कविताएं

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मेरे मौहल्ले में कुछ तितलियां आने लगीं,
सूखे शज़र पर भी नई पत्तियां आने लगीं।

अभी बसता हूँ किसी की यादों के शहर में,
ग़ज़ल पढ़ने से मुझे हिचकियां आने लगीं।

मुझे भी पहचानते हैं तुम्हारे शहर के लोग,
अब मेरे पते पर मेरी चिटि्ठयां आने लगीं।

लगता है मेरा महफ़िल में रुतबा बढ़ गया,
अगली सफ़ों के लिए कुर्सियां आने लगीं।

अभी क़िस्मत में शायद कुछ ख़्वाब बचे हैं,
रात हुई नहीं नींद की झपकियां आने लगीं।

अब शैतान क़ैद करना मुश्किल नहीं कोई,
मज़हब ज़ात भूलकर रस्सियां आने लगीं।

जल्दी,चूहों से कह दो कहीं और चले जाएं,
मेरे घर के अन्दर तक बिल्लियां आने लगीं।

चांद ने मेरी तरफ़ झांक कर जो देख लिया,
साथ के जुगनुओं को सुबकियां आने लगीं।

ये तूफ़ान मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगें,
ज़फ़र मां की दुआ से कश्तियां आने लगीं।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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