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मेरे अल्फाज़

तुम आज ही जंग का ऐलान कर दीजिए

Zafaruddin Zafar

174 कविताएं

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अभी उसकी मौत का सामान कर दीजिए,
तुम आज ही जंग का ऐलान कर दीजिए।

धूल ना जम जाए उनकी वीरगाथाओं पर,
तुम जल्द शहीदों का सम्मान कर दीजिए।

ये आंखें ग़मगीन है अपनों के बिछुड़ने से,
चेहरे पर ख़ुशियों की मुस्कान कर दीजिए।

काम मुश्किल है मगर कह रहा हूँ आपसे,
सारे जहां का नाम हिन्दुस्तान कर दीजिए।

वैसे तो भरोसा है अपनी फ़ौज़ पर मगर,
जनता को लड़ने का फरमान कर दीजिए।

मैं देश की खातिर तिरंगे में लिपट जाऊं,
मुमकिन है तो इतना अहसान कर दीजिए।

दुश्मन को ईंट का जवाब पत्थर से देकर,
दुनियां में हिन्द की ऊंची शान कर दीजिए।

अब दुश्मन के नापाक क़दमों को मिटाकर,
तुम पाक अपनी घाटी गलवान कर दीजिए।

ज़फ़र सारी सरहदों की हिफ़ाज़त के वास्ते,
अटूट प्रेम बंधन में राम रहमान कर दीजिए।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ़- 413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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