आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   WATANPARASTI ME MUQADDAR AZMANE CHALA HU

मेरे अल्फाज़

वतनपरस्ती में मुक़द्दर आज़माने चला हूं

Zafaruddin Zafar

188 कविताएं

218 Views
अपनी सरहदों पर ताक़त बढ़ाने चला हूं,
वतनपरस्ती में मुक़द्दर आज़माने चला हूं।

नापाक क़दम अपने मुल्क़ की सरहदों से,
मैं हौंसले को लेकर साथ भगाने चला हूं।

ऐ शहीदों इसे खिराजे अकीदत समझना,
आज दुश्मनों में खलबली मचाने चला हूं।

भाग जाएंगे अंधेरे, अब रौशनी हो जाएगी,
उसकी ग़ुरूर भरी दुनिया जलाने चला हूं।

वक़्त के हालात या शहीदों के मुक़द्दर से,
जितने रह गए काम अधूरे बनाने चला हूं।

'ज़फ़र' उसको बुरा लगे तो लग जाए मगर,
मैं एक सो चुके दरबान को जगाने चला हूं।

-ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!