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मेरे अल्फाज़

वो शेर नहीं हैं शेर की गुर्राहट लिए घूमते हैं

Zafaruddin Zafar

168 कविताएं

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वो शेर नहीं हैं शेर की गुर्राहट लिए घूमते हैं,
ऐसे वैसे लोग तक झुंझलाहट लिए घूमते हैं।

दिल में अगर देखो तो ग़मगीन बहुत हैं मगर,
चेहरे पे अपने झूंठी मुस्कुराहट लिए घूमते हैं।

शहर की झील में उतरेगा चांद आज रात को,
लोग दिन भर ऐसी सुगबुगाहट लिए घूमते हैं।

मिलते हैं सभी प्यार से,मुश्किल हुआ बताना,
कितने लोग दिल में कड़वाहट लिए घूमते हैं।

जब जब मिलो सुनाएंगे, ज़लज़लों के किस्से,
जो लोग बस्ती की थोड़ी आहट लिए घूमते हैं।

कभी अपना उधार मांग लो तो रो पड़ेंगे मगर,
उनकी जेब झांको तो गरमाहट लिए घूमते हैं।

जब वक़्त धा शिकार का,छोड़ा नहीं इक तीर,
अब क्यूं आंखों में तिलमिलाहट लिए घूमते हैं।

समन्दर से आंख मिलाने की हिम्मत नहीं मगर,
वो सूखे हुए दरिया में छटपटाहट लिए घूमते हैं।

'ज़फ़र' पल भर में पढ़ लिया कैसे मिज़ाज मेरा,
वो दिल में ऐसा सोचकर घबराहट लिए घूमते हैं।

-ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32

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