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मेरे अल्फाज़

ज़िन्दगी की चादर भी ऐसे उतरती गई

Zafaruddin Zafar

155 कविताएं

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ज़िन्दगी की चादर भी ऐसे उतरती गई,
मैं सिलता रहा लेकिन वो उधड़ती गई।

क्या हासिल हुआ है सुबह हो जाने से,
ओस तक सिमट गई धूप बिखरती गई।

कोशिशें की हसरत बर्फ करने की मगर,
वो दर्द की आंच से और पिघलती गई।

मेरे ख़्वाबों के घरोंदे बिखरते रहे मगर,
वो रास्ते समझकर उनसे निकलती गई।

मेरे सामने खड़ी थीं सारी ज़िम्मेदारियां,
बात सांसों की फिर भी बिगड़ती गई।

सोचो अगर रिश्ता खुरशीद से है मगर,
चांदनी चांद पर फिर भी लिपटती गई।

अरमान रो रो कर दम तोड़ते रहे मगर,
ग़म की रेल मेरे दिल पर गुजरती गई।

उस पार जाने की बहुत ज़िद थी मगर,
हौंसला जो टूट गया नदी उफनती गई।

मेरी आवाज़ मेरे दिल में घुटके रह गई,
बारिश पड़ती रही बिजली कड़कती गई।

मैं उसकी फितरत को नापता भी कैसे,
मौसम के साथ अपने रंग बदलती गई।

ज़फ़र मरहम की जुस्तजू लिए थे मगर,
चोट सारे ज़ख्मों की और उभरती गई।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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