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Kishor Kumar

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

घोर निराशा के अंधेरे में पली आशा-आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ

सत्यम कुमार सिंह, भागलपुर

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बहुत साल पहले, बीसवीं सदी की शुरुवात में गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत की आज़ादी के संदर्भ में एक कविता (प्रार्थना) लिखी थी- ‘जहाँ मन भय मुक्त हो और सिर सम्मान से उठा हो’। (चित्त जेथ भोय शून्य – where the  mind is without fear & the head is held high’)। यह एक स्वप्न था जो आने वाले समाज के लिए देखा गया था। 

इस कविता के जिक्र के साथ ही मुझे किशोर दा का ये गीत भी याद आने लगता है - ‘आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ, एक ऐसे गगन के तले, जहां ग़म भी न हो...’। ये गाना 'दूर गगन की छाँव' फिल्म का है, जो 1964 में आई थी। यह फिल्म किशोर कुमार के प्रतिभा के विस्फोट का सबूत है।
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आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ

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