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रंग दे बसंती

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

आजा सांझ हुई मुझे तेरी फ़िकर...

हरि कार्की, काव्य डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

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हमारे पास समय के साथ ऐसे अनुभव होते जाते है जिन्हें अपने भीतर महसूस करके हम उस चेतना, ऊष्मा या रौशनी से मिल पाते है जो हमें इंसान बनाती है। आम दिनों में ऐसे ही बेहद मामूली से प्रतीत होते अनुभव हमारे भीतर बड़े बदलाव करते हैं। हम जिस सूरज को रोज देखते है वो ऐसे ही एक दिन उगते हुए अचानक ज़्यादा करीब महसूस होता है और शीतल भी। इसी तरह जिन गीतों, धुनों या आवाज़ों को हम आज तक केवल सुन रहे होते हैं वो सब भी एक शाम, चाय में घुली इलायची के स्वाद को पहचान लिए जाने की तरह ही हमारे भीतर संगीत के स्वाद की पहचान को जगा देती है।

हम सब की चेतनाओं में ऐसे ही अलग-अलग अनुभवों के चित्र होते हैं। जो हमें रूकने नहीं देते, हमें बेहतर करते जाते हैं औेर हम लगातार यात्रा करते हुए उस ओर पहुंचने की कोशिश करते जाते हैं जहां हर तरह की हिंसा और अति की कोई जगह नहीं होती। आगे पढ़ें

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