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दुष्यंत कुमार

मुड़ मुड़ के देखता हूं

यादें: दुष्यंत कुमार का साथ और उर्दू की ग़ज़ल को हिंदी के कवि ले उड़े...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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दुष्यंत कुमार हिंदी साहित्य में एक बड़ा नाम है। इन्होंने हिंदी भाषा में गजलों को पेश करते हिंदी साहित्य में एक नई बयार बहाई थी। दुष्यंत से पहले शमशेर बहादुर, निराला, हरिकृष्ण प्रेमी, शंभुनाथ शेष, चिरंजित ने गजलें पेश की लेकिन ये कवि उसे उर्दू से अलग नहीं कर पाए थे। बलवीर सिंह रंग, बालस्वरूप राही, सूर्यभानु गुप्त ने हिंदी गजलों को लोकप्रिय बनाया था। लेकिन दुष्यंत कुमार ने गजल को हिंदी कविता की मुख्य धारा में शामिल करने की पुरजोर कोशिश की और वह इसमें पूरी तरह सफल भी हुए। 

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए 

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए 

न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए 

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए 

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए 

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए 

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

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