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Mirza ghalib in time of pandemic

मुड़ मुड़ के देखता हूं

जब उन दिनों फैली महामारी तो मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा कि...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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ये पहली दफ़ा नहीं है कि विश्व किसी महामारी से जूझ रहा है। पहले भी इस तरह के वायरस गाहे-बगाहे आते रहे हैं। ऐसे वक़्त में एक ज़रूरी मसअला नज़रिए का भी है, इसलिए जब-जब वबा यानी महामारी फैली उस समय के महान लोगों ने अपने ख़याल ज़ाहिर किए। इन्हीं में अज़ीज़ शायर मिर्ज़ा ग़ालिब भी शामिल हैं। सो हुआ यूं कि मिर्ज़ा साहिब दिल्ली में थे, वैसे तो वे दिल्ली के ही थे लेकिन कलकत्ते और बनारस भी कई दिन रहना हुआ। 

लेकिन जब वबा फैली तो मिर्ज़ा साहब दिल्ली में थे। उन दिनों कॉलेरा महामारी फैली हुई थी। 1817 में इसका प्रकोप पहली बार दुनिया ने देखा तब लगभग 6 साल बाद प्राकृतिक कारणों से यह ख़त्म हो गयी। दूसरी बार 1829 में तीसरी बार 1840 में यह फिर आयी। इसके बाद 1852 से 1923 के बीच लगभग 4 बार यह फैली। 

मिर्ज़ा ग़ालिब के साथ यूं हुआ कि लगभग 1868 में इसी महामारी के दौर में वे घर से बाहर निकलने को हुए तो घबराई हुई बेग़म ने टोका कि - जल्दी लौट आना, बाहर वबा फैली हुई है। इस पर हाज़िर जवाब मिर्ज़ा साहब बोले कि "कहां की वबा, कैसी वबा। मैं 71 साल का बुड्ढा, तुम 69 साल की बुढ़िया। दोनों में से एक भी मरा होता तो मान लेते कि वबा आयी है।" 

इसके बाद उन्होंने पढ़ा कि 

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहां कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बां कोई न हो

(हम-सुख़न - एक बात करने वाले
हम-ज़बां - एक भाषा बोलने वाले)

पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वां कोई न हो

(तीमारदार - बीमार का ध्यान रखने वाला
नौहा-ख़्वां - शोकगीत गाने वाले)

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