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safia akhtar letter to husband jan nisar akhtar

मुड़ मुड़ के देखता हूं

"तुम्हारी एक निगाह मेरी ज़िंदगी में उजाला कर देती है" - सफ़िया का ख़त जां निसार अख़्तर के नाम

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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सफ़िया - उर्दू के प्रसिद्धतम शायर मजाज़ की बहन और जां निसार अख़्तर की पत्नी।

अख़्तर मेरे,
पिछले हफ़्ते तुम्हारे तीन ख़त मिले और शनिवार को मनीऑर्डर भी वसूल हुआ, तुमने तो पूरी तनख़्वाह ही मुझे भेज दी। तुम्हें शायर तंगी में बसर करने में मज़ा आने लगा है। यह तो कोई बात न हुई दोस्त! घर से दूर रहकर वैसे ही कौन-सी आसाइश तुम्हारे हिस्से की रह जाती है जो मेहनत करके जेब भी ख़ाली रहे ? ख़ैर! मेरे पास वो पैसे भी, जो तुमने बंबई से रवानगी के वक़्त दिए थे, जमा हैं. और ये भी। अब मैं तुमने अलग रहकर पैसे की हिफ़ाज़त करना सीख गई हूं।

परसों कॉलेज में मुशायरा था। अख़्तर सईद और ताज भी आए थे। मुलाक़ात हुई थी। ताज ने घर पर आने को भी कहा था। शायर बीस को वापसी का इरादा रखते हैं। बन पड़ा तो कुछ उनकी मार्फ़त भेज ही दूंगी।

कल शहाब की मां, उनकी बीबी और नौशा साहब की बीबी आ गई थीं। आज तन्हाई है। अदीस को नज़ला हो गया है। उसकी तीमारदारी में लगी हूं। इसने भी तुमको ख़त लिखवाया है। 

अच्छा अख़्तर! अब कब तुम्हारी मुस्कुराहट की दमक मेरे चेहरे पर आ सकेगी। तुम्हारी एक निगाह मेरी ज़िंदगी में उजाला कर देती है। सोचो तो, कितनी तारीक़ औऱ बदहाल थी मेरी ज़िंदगी, जब तुमने उसे संभाला। कितनी बंजर और कैसी बेमानी तल्ख़ थी मेरी ज़िंदगी, जब तुम मेरी दुनिया में दाख़िल हुए और मुझे उन गुज़रे हुए दिनों पर ग़म होता है, जो हम दोनों ने अलीगढ़ में एक-दूसरे की शिरकत से महरूम रहकर गुज़ार दिए। अख़्तर! मुझे आईंदा की बातें मालूम हो सकती हैं, तो सच जानो, मैं तुम्हें उसी ज़माने में बहुत चाहती। कोई कशिश तो शुरू से ही तुम्हारी जानिब खींचती थी और कोई घुलावट ख़ुद ब ख़ुद मेरे दिल में पैदा थी, मगर बताने वाला कौन था कि यह सब क्यों ?

आओ! मैं तुम्हारे सीने पर सिर रखकर दुनिया को मग़रूर नज़रों से देख सकूंगी।

तुम्हारी अपनी 
- सफ़िया
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