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प्यार और जिंदगी

वायरल

सोशल मीडिया: किसी की ज़िन्दगी के नाज़ पलकों पर उठाने की

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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किसी की ज़िन्दगी के नाज़ पलकों पर उठाने की,
अरे दरकार क्या है रात दिन आंसू बहाने की। 

दबे जाओ, कुचे जाओ, मरे जाओ, जिए जाओ,
ज़रूरत क्या पड़ी है इस तरह वादा निभाने की। 

किसी से जीतने की सोच के कुछ ऐसा लगता है,
कहीं आदत न पड़ जाए किसी से मात खाने की। 

कभी मुझसे मिलो भी तो संभल करके जहां वालों,
बुरी आदत है मेरी आज भी दिल में समाने की। 

मेरे मालिक कि सीखों से मुझे क्या रोक लोगे तुम,
कहां आदत है अपनी आदतों से बाज़ आने की।

~डाॅ. राहुल अवस्थी  

अभिनव चौहान की फेसबुक वाल से
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