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kahlil gibran prem kavita

विश्व काव्य

जब प्रेम तुम्हें बुलाये, उसके साथ जाओ,चाहे उसका मार्ग कठोर और बेहद कठिन ही क्यों न हो- ख़लील जिब्रान

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जब प्रेम तुम्हें बुलाये, उसके साथ जाओ,
चाहे उसका मार्ग कठोर और बेहद कठिन ही क्यों न हो
और जब उसके पंख तुम्हें अपने में समेट लें, उनमें समा जाओ
हालांकि उसके पंखों में छिपी तलवार तुम्हें घायल कर सकती है
और जब वो तुमसे मुखातिब हो, उस पर विश्वास करो
चाहे उसकी आवाज़ तुम्हारे सपनों को ऐसे बिखेर क्यों न दे
जैसे उत्तरी हवा बागीचे को बर्बाद कर देती है

यदि प्रेम तुम्हे ताज पहनाता है तो यह तुम्हें सलीब पर भी लटकायेगा,
यदि यह तुम्हें बड़ा करता है तो यह तुम्हारी काट-छांट भी करेगा.
जैसे यह तुम्हारी ऊंचाई तक पहुँच कर सूरज में कांप रही नर्म शाखाओं को सहलाता है,
वैसे ही यह तुम्हारी जड़ों तक उतर कर उन्हें ज़मीन से हिला भी देता है.

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