मेघालय का मौप्लाङ्ग: खासी पहाड़ियों में एक घास का पत्थर  

Teji Ishaतेजी ईशा Updated Sun, 28 Jun 2020 08:21 AM IST
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मौप्लाङ्ग मेघालय के खूबसूरत जगहों में से एक है
मौप्लाङ्ग मेघालय के खूबसूरत जगहों में से एक है

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शिलॉन्ग पहुंचेंगे तो सचमुच यही लगेगा कि यह तो मेघ का घर ही है। यहां पहुंचते ही अंदर से कंपकंपी सी होने लगी। पिछले कई दिनों की यात्रा के बाद देह बारिश के अनमने साथ को अभ्यास करते हुए सहज हो गया है। यहां कार्यक्रम के दौरान दो दिनों में एक टोली-सी बन गई थी। जिसमें हिंदी भाषी की मैं और बाकी नगालैंड, आसाम, और मेघालय की लड़कियां थी। हम लोगों में शुरू में भाषाई दिक्कतें आई। फिर बाद में चीजें धीरे-धीरे समझ में आने लगी। 
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तीन दिनों में यह पता चल चुका था कि हम सभी घुमंतू हैं और कई बनतु चीजों से अलग रहने वाले लोग थे, शायद यही चाहत हम चारों की टोली बना ले गई थी। रुकने की आखिरी रात थी। हम सब एक दूसरे को बहुत कुछ सुना-बता देना चाहते थे। सबके अंदर एक दूसरे के लिए इतनी सहजता और समंजस्य कैसे हो गया पता नहीं। ऐसा लग रहा था जैसे कई सालों का एक दूसरे से गांव, पहाड़, पर्वत, मैदान, सुपारी, मछ्ली, बांस का रिश्ता हो। लौटने का अफसोस होने लगा था। सबके मन में शायद साथ रहने की इच्छा थी। 
इसलिए मेगाला ने जैसे ही कहा कि "इफ यू डोंट माइंड कम विथ मी, माय प्लेस इज वेरी स्माल, बट स्टिल वी आर एडजस्ट देयर, आई नो यू अल्ल नाउ!" उसके इस वाक्य के खत्म होते ही हम तीनों के मुंह से निकला हां चलते हैं। हमें कोई दिक्कत नहीं है बस तुम्हें और तुम्हारे घर वालों को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। उसने कहा कि बाथरूम यहां की तरह नहीं है लेकिन कोई दिक्कत नहीं होगी। बस दिमाग में यही आया बाकी औरतें तो रह ही रहीं होंगी।
मुझे क्या है, मैं भी रह लूंगी। अब सुबह लंबी नहीं बची थी पर अंधेरा घना था। नौ बजे बादल के कारण अंधेरा-अंधेरा सा था। सब एक जगह ही सोये थे। सुबह समय से साढ़े दस बजते हम लोग गाड़ी में बैठ चुके थे। एक बार फिर दूसरे बांस की दुनिया में जाने के लिए सर्पीले रास्ते से होकर।

दूसरा पहर
शिलॉन्ग के बाज़ारों से निकले हुए आधे घंटे हो गए थे। एक दुकान पर मेगाला और मैंने कुछ  चिप्स, बिस्किट और पान-सुपारी खरीदा। गिङ्ग्की और सुब्बा सबकी तस्वीरों को कैद करने में व्यस्त थी। दिन का दूसरा पहर शुरू हो चुका था। बादल से बनता कुहासा जमीन पर उतरता महसूस हो रहा था। गाड़ी में खासी गीत नए अंदाज में चल रहा था। सुपारी के स्वाद को कुम्हलाते हुए मेरी नजर दूर तक जाना चाहती थी। जिसमें खड़े पहाड़, उसके सिरमोर बने पाइन और साल के पेड़, झांकते सुपारी के पेड़, अनगिनत बांस की झाड़ियां, बांस के टोपी पहने कतार में चलते लोग... इन सब चलचित्र को 40 की स्पीड से चलने वाली गाड़ी से बैठे-बैठे कैद करना था मुझे, अपने अन्तःमन में। मेगाला ने कहा कि एलिफेंट फॉल पर रुकते हैं।

यह वाकई 'का कशिद लाइ पटेंग खोहस्यू' ही है, जिसका लोकल खासी भाषा में मतलब है - 'एक ऐसा झरना जो तीन सतहों में गिरता है'। पहली झलक में ही सामने एक विशाल पत्थर है जो हाथी के पैर की तरह दिखता है। इसीलिए इसका नाम शायद एलिफेंट फॉल रखा गया है, अंग्रेज ऐसे भी नामांकरण करने में बहुत होशियार थे तो शायद 1897 में आए भूकंप के बाद बिखरे विशाल चट्टानों पर ऊपर से गिरते पानी की लहर आई होगी तो हाथी-सा आकार का दिखाई पड़ा होगा। 

गर्दन ऊंचा करने के बाद साफ दिखता है पानी की पहली परत बहुत ही घने पेड़ों पर छाते की तरह अटक सा गया है, फिर पानी की पतली धार नीचे गिरती  हुई उस रस्सी की बिम्ब बनाती है जो ऊपर से इस पानी के छाते को खींच रही है। तीसरी परत बहुत लुभावनी और आकर्षक सी है। मेरी गर्दन अभी भी पीछे की ओर झुक कर उस सांवले दुल्हन को देखने के लिए नजर गड़ाए हुये है जो इस गिरते जल को अपनी सफेद भींगी रेशमी चादर बनाकर अपना मुंह ढके हुये हैं।

ये एक संयोग था कि बारिश के बाद के ठंढ में हम गए थे। ऐसा लग रहा था कि मेरे साथ साथ ठंढ की अगुआई से झाड़ियां, पेड़, हरी-भूरी खेत सब हल्की-हल्की कांप रहें हो। पाला-फिश-ईगल फुहारे वाले आकाश की बजाय खड़े पेड़ों पर दुबके हुए थे। मेरे नजरों की लुकाछिपी में आते-उड़ते हुए इस कोमल ठंढक में सिर्फ हिमालियन स्विफ्टलेफ्ट और डोरोंगों कुक्कू ने साथ दिया था। 

हाथी के पांव के करीब जाने के लिए लगभग 100 सीढ़ियों की हल्की फिसलन, कौंधाते हुए मुझे कई टन ऊर्जाओं से भरते जाती। फेफड़े में वहां की हवाएं घुलती जा रही थी। आंखो की पीपनी पर फुहारे तैर रहे थे और नजरें ठीक उस लेंस की तरह काम कर रही थी जैसे उसे सभी फ्रेम क्लिक कर दिलोदिमाग के हार्डडिस्क में सेव करना है। 
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