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संघ ने नहीं दी थी तीसरी कारसेवा की इजाजत, विहिप के साथ देर रात तक चला था मंथन

अखिलेश वाजपेयी, लखनऊ Updated Sat, 16 Nov 2019 02:42 AM IST
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demo pic - फोटो : Social Media
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अयोध्या आंदोलन के दौरान 1990 में एक दौर ऐसा भी आया था जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सहयोगी संगठनों को कारसेवा आंदोलन चलाने से मना कर दिया था। इसको लेकर संघ और विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेतृत्व के बीच 3 नवंबर की देर रात तक मंथन चला। 
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विहिप तीसरे दौर की कारसेवा के लिए कारसेवकों के कूच का आह्वान करना चाहती थी, लेकिन संघ नेतृत्व इसके लिए राजी नहीं हुआ। इसी के बाद एक महीने का जेल भरो आंदोलन चलाकर देश भर के कारसेवकों को अयोध्या बुलाकर जनजागरण कार्यक्रम चलाया गया।

विहिप ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए 30 अक्तूबर 1990 को कारसेवा का आह्वान किया था। वहीं, प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार ने घोषणा कर रखी थी कि अयोध्या में परिंदा को भी पर नहीं मारने देंगे। 

इसके बाद यह आंदोलन एक तरह से संघ परिवार और मुलायम सिंह सरकार के बीच शक्ति परीक्षण का मुद्दा बन गया। मुलायम सरकार ने अयोध्या जाने वाले सारे रास्ते सील करा दिए। बसों का संचालन भी रोक दिया गया तथा रेलगाड़ियों का संचालन भी वाया अयोध्या रुक गया। 

इसके बावजूद अशोक सिंघल सहित संघ के कई प्रमुख पदाधिकारी अयोध्या पहुंच चुके थे। तमाम कारसेवक भी पैदल चलकर अलग-अलग रास्तों से सुरक्षा बलों से छिपते-छिपाते अयोध्या पहुंच गए थे, जिन्हें संघ और विहिप ने अलग-अलग चुपचाप ठहराया था।  

चल गई गोली
निर्धारित दिन कूच के आह्वान पर अयोध्या की सड़कों पर अपने घरों से निकलकर तमाम अयोध्यावासी और मठ-मंदिरों से निकलकर दूसरे स्थानों से आए सैकड़ों कारसेवक संबंधित स्थल की तरफ बढ़ने लगे तो हड़बड़ाए अधिकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। पर, कारसेवकों ने रास्ते की कई बैरिकेडिंग तोड़ दीं।

पहले लाठीचार्ज हुआ लेकिन कारसेवकों को रोकने में सुरक्षा बलों को सफलता नहीं मिली तो उन्होंने गोली चलाई। इस बीच, कुछ कारसेवक संबंधित स्थल पर पहुंच गए। वहां भी गोली चली। कुछ कारसेवक मारे गए। सिंघल को भी सिर पर चोट लगी। संघ को इससे बड़ा धक्का लगा। पर, सिंघल ने 2 नवंबर को फिर कूच का आह्वान किया। इस बार भी संघर्ष हुआ और कोठारी भाइयों सहित कई कारसेवकों की मौत हो गई।

इसलिए संघ ने नहीं दी तीसरे कूच की इजाजत
सूत्र बताते हैं कि दो बार गोली चलने की घटना ने संघ नेतृत्व को चिंता में डाल दिया था। दूसरी तरफ अशोक सिंघल तीसरे कूच के लिए आह्वान करने का मन बना चुके थे। वे इस मुद्दे पर सरकार से आर-पार कर लेना चाहते थे। सिंघल लगातार कह रहे थे कि मुस्लिम तुष्टीकरण के चक्कर में हिंदुओं के साथ यह अत्याचार किया जा रहा है। पर, संघ नेतृत्व इन घटनाओं से काफी आहत था।

वह कार्यकर्ताओं की जिंदगी दांव पर लगाने को तैयार नहीं हुआ। सिंघल ने 4 नवंबर को तीसरी बार कूच का निश्चय कर लिया था, लेकिन संघ के वरिष्ठ प्रचारक और अयोध्या आंदोलन के रणनीतिकार भाऊराव देवरस ने दो टूक मना कर दिया। इसको लेकर संघ परिवार के शीर्ष नेतृत्व के बीच कई बार मंथन हुआ। अयोध्या में 3 नवंबर की देर रात तक बैठकों के दौर चले।

भाऊराव नहीं माने
सूत्रों के अनुसार, सिंघल का तर्क था कि दो बार गोली चलने के बाद सुरक्षा बलों में भी सरकार को लेकर आक्रोश है। इस बार वह गोली चलाने के बजाय विद्रोह कर देंगे, जिससे कारसेवक संबंधित स्थल पर पहुंच जाएंगे। यह हिंदुत्व की बड़ी जीत होगी। पर, भाऊराव अपने निर्णय पर पुनर्विचार को तैयार नहीं हुए। उनका कहना था कि वह युवकों को उनके घरों से आत्मघाती रास्ते पर चलने के लिए नहीं लाए हैं।

वैसे भी संघ का काम किसी से संघर्ष या टकराव करना नहीं बल्कि रचनात्मक है। फिर अयोध्या आए हिंदू समाज के एक-एक व्यक्ति के जीवन की जिम्मेदारी संघ पर है। अगर इसी तरह निहत्थे कार्यकर्ताओं को संगीनों के सामने मरने के लिए खड़े कर देंगे तो समाज में संघ पर भरोसा घटेगा। इसलिए अब कूच नहीं होगा बल्कि सत्याग्रह और जेल भरो आंदोलन के जरिये हिंदू समाज का जागरण करेंगे।
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