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राजा विक्रमादित्य के भाई प्रेम की अमिट निशानी है चुनार का दुर्ग

mirzapur/amarujala Published by: विचित्र सिंह Updated Mon, 04 May 2020 10:14 AM IST
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Chunar fort
Chunar fort - फोटो : amar ujala

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मिर्जापुर । चुनार नगर के मध्य गंगातट पर स्थित चुनार दुर्ग राजा भर्तहरि के बैरागी होने की निशानी है। लगभग 2000 वर्ष पूर्व राजा भर्तहरि ने इसी दुर्ग में समाधि ली थी उस समय राजा विक्रमादित्य अपने भाई को मनाने आए थे लेकिन राजा भर्तहरि नहीं माने। इस पर राजा विक्रमादित्य ने इस दुर्ग की सुरक्षा के लिए चारों ओर परकोटे का निर्माण कराया । इसका गौरवशाली इतिहास रहा है। 
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दुर्ग पर लगभग 600 वर्षों तक मुगलों ने शासन किया। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के बाद दुर्ग पर 1141 से लेकर 1750 तक मुगल शासकों ने शासन किया। इसके बाद 1765 से 1781 तक दुर्ग पर अग्रेजों की हुकुमत रही। पहले चुनार का यह दुर्ग बनारस सूबे में था। विक्रमादित्य के बाद इस दुर्ग पर पृथ्वीराज राय पिथौरा, सहाबुददीन मुहम्मद गोरी, स्वामी राज, मोहम्मद शाह जौनपुर, सिकंदर लोदी दितीय, बाबर, शेरशाह सूरी, हुमायूं, इस्लाम शाह, अकबर, मिर्जा मुकीम  सुजाउदौला नबाब आफ अवध मुगल शासक के साथ वारेन हेस्टिंग्स अंग्रेज शासक ने शासन किया था। इन शासकों ने कब कब शासन किया इसका उल्लेख दुर्ग के पूर्वी द्वार पर लगाये गये शिलापटट पर अंकित है। 


जनश्रुति के मुताबिक लगभग दो हजार वर्ष पूर्व उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के भाई राजा भतृहरि नाथ घर परिवार त्यागकर तप साधना के लिए निकले और वह दुर्ग स्थल पर पहुचे। गंगातट पर स्थित यह दुर्ग उनके मन को भा गया और यही तप करने लगे। भाई की तलाश करते हुए राजा विक्रमादित्य इस दुर्ग पर पहुचे उस समय दुर्ग खंडहर जैसा था। राजा भतृहरि नाथ को वापस उज्जैन ले जाने के लिए राजा विक्रमादित्य ने काफी कोशिश की लेकिन वह वापस नही गये। उसी समय राजा विक्रमादित्य ने किले की चहारदीवारी बनवाकर दुर्ग को सुरक्षित किया। बाद में राजा भतृहरि नाथ ने इसी दुर्ग के नीचे समाधि ली।

 भतृहरि नाथ की समाधि के पास एक छोटा सा छिद्र है जो श्रद्धा भाव से सरसों का थोड़ा तेल डालने पर वह भर जाता है लेकिन अहंकार कर उसे नही भरा जा सकता है । एक बार औरंगजेब ने अहंकार से उस छिद्र को भरने की कोशिश की लेकिन वह नही भर सका। बाद में क्रोधित होकर उसने तेल गर्म कर डलवा दिया जिससे छिद्र से भौरे निकले और उसे घायल कर दिया। इसका एक लिखित प्रमाण अरबी भाषा में मुगल शासक औरंगजेब ने दिया है जो आज भी समाधि स्थल के पास लगा हुआ है। देश ही नही बल्कि विदेशों से भी इस दुर्ग को व उसमें स्थित रानी सोनवा का मंडप, विशालकाय बाउली, धूप घड़ी व वारेन हेस्टिंग्स का बगला देखने आज भी तमाम लोग आते रहते हैं

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