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बेहद दिलचस्प है हमारी संसद का शायराना सफर

Rama Solanki रमा सोलंकी
Updated Tue, 17 Dec 2019 07:12 PM IST

सार

  • जब प्रधानमंत्री ने कविता से दिए संसद में जवाब
  • मल्लिकार्जुन खड़गे ने कविता के रूप में पूछा था सवाल
  • जब सुषमा स्वराज के शेर पर मुस्कुराए थे मनमोहन सिंह
  • बशीर बद्र की शायरी संसद में गूंजी
  • ओवैसी और भगवंत मान का शायराना अंदाज
  • जब अरुण जेटली ने बजट के दौरान पढ़ी थी शायरी
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संसद का शायराना सफर
संसद का शायराना सफर - फोटो : Amar Ujala

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विस्तार

देश के लिए महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने और कानून बनाने वाली संसद की प्रकृति गंभीर है। लेकिन यहां हास-परिहास का भी खूबसूरत दौर चलता है। यह दौर इसलिए यादगार बन जाता है, क्योंकि गंभीर विषयों पर भी सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष शेरो-शायरी की शक्ल में एक-दूसरे पर निशाना साधते हैं। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस शेर पर कि, 'हमें है उनसे वफा की उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है।' इस पर तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने यह शेर पढ़ा था कि, 'कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता।’
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इसी तरह जुलाई 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे गंभीर व्यक्ति ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा था, 'न मांझी, न रहबर, न हक में हवाएं हैं, कश्ती भी जर्जर, ये कैसा सफर है।' वैसे भी बशीर भद्र का शेर कि 'दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों', तो संसद का पसंदीदा और चर्चित शेर हो गया है। आज हम ऐसे ही कुछ शेर-ओ-शायरी के साथ संसद के शायराना सफर को आपके समक्ष रख रहे हैं:
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संसद का शायराना सफर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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