अपराजिता: महिलाएं बोलीं- परिवार में हों संस्कार, सख्ती से लागू हों कानून तो होगी असली महिला सुरक्षा

अमर उजाला नेटवर्क, मोहाली Updated Mon, 02 Mar 2020 04:17 PM IST
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अपराजिता में हिस्सा लेने आईं महिलाएं
अपराजिता में हिस्सा लेने आईं महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

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आधुनिक युग में ग्लोबल विलेज बन चुकी दुनिया के बीच अपनी संस्कृति और संस्कारों को संभाल पाना मुश्किल है। भारत जैसा देश, जो सदियों गुलामी का शिकार रहा, अपनी वास्तविक पहचान को भूल चुका है। आजादी के 70 साल बाद भी हम मुगलों की गुलामी से देेश में पैदा हुई रूढ़िवादिता और अंग्रेेजों की गुलामी से पनपी पाश्चात्य श्रेष्ठता के मायाजाल में उलझे हुए हैं।
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इस सब के बीच भले ही महिलाएं शिक्षित होकर परिवार और देश की अर्थव्यवस्था में भागीदारी दे रही हों, फिर भी घर, ऑफिस से लेकर सड़क तक भेदभाव कायम है। इस भेदभाव की वजह अपनी मूल संस्कृति से भटकाव है। वहीं, देश में महिला सुरक्षा को लेकर सरकार ने कानून तो बनाए हैं, लेकिन उन्हें लागू करने में पुरुष प्रधान व्यवस्था नकारा साबित हुई है। ये विचार शनिवार को टीडीआई सिटी में हुए अमर उजाला के अपराजिता कार्यक्रम में विभिन्न आयु वर्ग की महिलाओं ने रखे।
समस्या मर्दों में, वो खुद को बेहतर समझते हैं। एक समय था जब घरों में लड़कियों को जूते-चप्पल छूने नहीं दिया जाता था। परिवार के लड़कों को बेटियों से दुर्व्यवहार करने पर डांटा जाता था। अफसोस, आज के सभ्य समाज में ऐसा नहीं होता। पारिवारिक परवरिश का स्तर तो गिरा ही है, लेकिन सरकार की नीतियां भी महिलाओं की लिए समस्या बनी हैं। सरकार नीतियां बनाने में तो रुचि दिखाती है पर उन्हें लागू करने में नहीं। बेटियों को शिक्षित करने के साथ ही उन्हें अपनी आजादी के सही इस्तेमाल के प्रति जागरूक करने की भी जरूरत है।
- नीलम वर्मा, रिटायर टीचर

महिला सुरक्षा के लिए जरूरी है कि लड़कों को शिक्षित करने के साथ संस्कार दिए जाएं। बच्चों को संस्कार देने की जिम्मेदारी मां के साथ-साथ पिता की भी है। संस्कार देने की जिम्मेदारी सिर्फ परिवार की नहीं हैं, स्कूल की भी है। आज स्कूलों में उस तरह की शिक्षा नहीं दी जा रही जो पुरुष प्रधान समाज में लड़कों को महिलाओं की इज्जत करना सिखाए। देश में महिला सुरक्षा कानून सिर्फ नाम के लिए है, वो इस तरह लागू नहीं हो रहा जिससे महिलाएं खुद को समाज में सुरक्षित महसूस कर सकें।
- मोनिका सोनी, बिजनेस वुमन
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