क्यों मनाई जाती है हरियाली तीज, क्या है इसका महत्व और पूजा विधि

अनीता जैन ,वास्तुविद Updated Thu, 23 Jul 2020 06:43 AM IST
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हरतालिका तीज
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सावन का महीना मस्ती, प्रेम और उत्साह का महीना माना जाता है। यह त्यौहार उत्तर भारत के अनेक प्रांतों में बहुत जोश और उमंग के साथ मनाया जाता है। हरियाली तीज मुख्यतः स्त्रियों का त्यौहार है जो श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। सावन का महीना आते ही आसमान काले मेघों से आच्छादित हो जाता है और वर्षा की फुहारें पड़ते ही हर वस्तु नवरूप को प्राप्त करती है,इस समय पृथ्वी चारों तरफ हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। तीज का सम्पूर्ण रंग प्रकृति के रंग में मिलकर अपनी अनुपम छठा बिखेरता है प्रकृति भी अपने सौंदर्य में लिपटी मानो इसी समय का इंतज़ार कर रही होती है। 
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हरियाली तीज की पौराणिक मान्यताएं
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, इससे प्रसन्न होकर शिव ने हरियाली तीज के दिन ही माँ पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। अखंड सौभाग्य का प्रतीक यह त्यौहार भारतीय परंपरा में पति-पत्नी के प्रेम को और प्रगाढ़ बनाने तथा आपस में श्रद्धा और विश्वास कायम रखने का त्यौहार है इसके आलावा यह पर्व पति-पत्नी को एक दूसरे के लिए त्याग करने का संदेश भी देता है। इस दिन कुंवारी कन्याएं व्रत रखकर अपने लिए शिव जैसे वर की कामना करती हैं वहीं विवाहित महिलाएं अपने सुहाग को भगवान शिव तथा पार्वती से अक्षुण बनाये रखने की कामना करती हैं। 

हरियाली तीज पूजा विधि
हरियाली तीज में हरी चूड़ियाँ, हरे वस्त्र पहनने,सोलह शृंगार करने और मेहंदी रचाने का विशेष महत्व है। इस त्यौहार पर विवाह के पश्चात पहला सावन आने पर नवविवाहित लड़कियों को ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है। लोकमान्य परंपरा के अनुसार नव विवाहिता लड़की के ससुराल से इस त्यौहार पर सिंजारा भेजा जाता है जिसमें वस्त्र,आभूषण, श्रृंगार का सामान, मेहंदी, घेवर-फैनी और मिठाई इत्यादि सामान भेजा जाता है। इस दिन महिलाएं मिट्टी या बालू से मां पार्वती और शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करती हैं। पूजन में सुहाग की सभी सामिग्री को एकत्रित कर थाली में सजाकर माता पार्वती को चढ़ाना चाहिए।

नैवेध में भगवान को खीर पूरी या हलुआ और मालपुए से भोग लगाकर प्रसन्न करें। तत्पश्चात भगवान शिव को वस्त्र चढ़ाकर तीज माता की कथा सुननी या पढ़नी चाहिए। पूजा के बाद इन मूर्तियों को नदी या किसी पवित्र जलाशय में प्रवाहित कर दिया जाता है।शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव और देवी पार्वती ने इस तिथि को सुहागन स्त्रियों के लिए सौभाग्य का दिन होने का वरदान दिया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो सुहागन स्त्रियां सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं,उनको सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। 

जयपुर में निकलती है तीज की सवारी
राजस्थान के लोगों के लिए यह त्यौहार जीवन का सार है। खासकर राजधानी जयपुर में इसकी अलग ही छठा देखने को मिलती है। तीज के अवसर पर जयपुर में लगने वाला यह मेला पूरी दुनिया में अपना एक विशिष्ठ स्थान रखता है। इस दिन तीज माता की पूजा-अर्चना के बाद  तीज माता की सवारी निकाली जाती है।पार्वती जी की प्रतिमा जिसे तीज माता कहते हैं,को जुलूस उत्सव में ले जाया जाता है।उत्सव से पहले प्रतिमा का पुनः रंग-रोगन किया जाता है और नए परिधान तथा आभूषण पहनाए जाते हैं शुभ मुहूर्त में जुलूस निकाला जाता है।

लाखों लोग इस दौरान माता के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ते हैं। सुसज्जित हाथी और घोड़े इस जुलूस की शोभा को बढ़ा देते हैं यह सवारी त्रिपोलिया बाज़ार,छोटी चौपड, गणगौरी बाज़ार और चौगान होते हुए पालिका बाग़ पहुंचकर विसर्जित होती है। सवारी को देखने के लिये रंग बिरंगी पोशाकों से सजे ग्रामीणों के साथ ही भारी संख्या में विदेशी पर्यटक भी आते हैं। चारों तरफ रंग-बिरंगे परिधानों में सजे लोग,घेवर-फीणी की महक,प्रकृति का सौंदर्य इस त्यौहार को और भी अनूठा बना देते हैं।

खुले स्थान पर बड़े-बड़े वृक्षों की शाखाओं पर बंधे हुए झूले,स्त्रियों व बच्चों के लिए बहुत ही मनभावन होते हैं। मल्हार गाते हुए मेहंदी रचे हुए हाथों से रस्सी पकडे झूलना एक अनूठा अनुभव ही तो है। नारियां,सखी-सहेलियों के संग सज-संवर कर लोकगीत,कजरी आदि गाते हुए झूला झूलती हैं। पूरा वातावरण ही गीतों के मधुर स्वरों से संगीतमय,गीतमय,रसमय हो उठता है। 

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