महावीर जयंती आज: दुनिया को ' जियो और जीने दो ' का पाठ पढ़ाने वाले भगवान महावीर

अनीता जैन Updated Mon, 06 Apr 2020 09:32 AM IST
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mahavir jayanti 2020
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करीब 600 वर्ष पहले कुण्डलपुर में क्षत्रिय वंश में पिता सिद्दार्थ और माता त्रिशला के यहां चैत्र शुक्ल तेरस को वर्धमान का जन्म हुआ। वर्धमान को महावीर के अलावा ' वीर ' ,'अतिवीर' और सन्मति भी कहा जाता है। भगवान महावीर ने पूरे समाज को सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाया। जैन धर्म का समुदाय इस पर्व को बड़ी धूम-धाम से एक उत्सव की तरह मनाते हैं।
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इसलिए कहलाए जितेंद्र 
भगवान महावीर के प्रारम्भिक तीस वर्ष राजसी वैभव एवं विलास के दलदल में  'कमल ' के समान रहे। उसके बाद बारह वर्ष घनघोर जंगल में मंगल साधना और आत्म जागृति की आराधना में वे इतने लीन हो गए कि उनके शरीर के कपड़े गिरकर अलग होते गए। 
भगवान महावीर की बारह वर्ष की मौन तपस्या के बाद  उन्हें 'केवलज्ञान ' प्राप्त हुआ। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद तीस वर्ष तक महावीर ने जनकल्याण हेतु चार तीर्थों साधु -साध्वी , श्रावक-श्राविका की रचना की। इन सर्वोदय तीर्थों में क्षेत्र, काल, समय या जाति की सीमाएं नहीं थीं। 

भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। उनका कहना था कि हम दूसरों के प्रति भी वही व्यवहार व विचार रखें जो हमें स्वयं को पसंद हों। यही उनका ' जीयो और जीने दो ' का सिद्धांत है। उन्होंने न केवल इस जगत को मुक्ति का सन्देश दिया, अपितु  मुक्ति की सरल और सच्ची राह भी बताई। आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु सत्य, अहिंसा , अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य जैसे पांच मूलभूत सिद्धांत भी बताए। 

इन्हीं सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारकर महावीर ' जिन ' कहलाए। जिन से ही 'जैन' बना है अर्थात जो काम,तृष्णा ,इन्द्रिय व भेद जयी है वही जैन है। भगवान महावीर ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया और जितेंद्र कहलाए। उन्होंने शरीर को कष्ट देने को ही हिंसा नही माना बल्कि मन, वचन व कर्म से भी किसी को आहात करना उनकी दृष्टि से हिंसा ही है।

अहिंसा का दिया संदेश
महावीर स्वामी अहिंसा के पुजारी थे उनका मानना था कि  इस सृष्टि में जितने भी त्रस जीव (एक, दो, तीन, चार और पाँच इंद्रिय वाले जीव) आदि की हिंसा नहीं करना चाहिए। उन्हें अपने रास्ते पर जाने से नहीं रोकना चाहिए। उन सब के प्रति सामान भाव रखना चाहिए, साथ ही उनकी रक्षा करनी चाहिए।

सदा सत्य बोलो 
सत्य के बारे में भगवान महावीर का कहना है कि मनुष्य को सत्य को सच्चा तत्व समझना चाहिए। सत्य के संबंध में भगवान महावीर ने कहा कि जो बुद्धिमान मनुष्य सत्य की ही आज्ञा में ही रहता है वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।

अपरिग्रह
भगवान महावीर ने अपरिग्रह के बारे में कहा कि जो मनुष्य निर्जीव चीजों का संग्रह करता है अथवा वह दूसरों से ऐसा संग्रह करवाता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की सलाह देता है। ऐसे व्यक्ति को दुखों से  कभी भी छुटकारा नहीं मिल सकता है।जगत के कल्याण हेतु भगवान महावीर ने ये संदेश अपरिग्रह के माध्यम से दुनिया को देना चाहा।

ब्रह्मचर्य
महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है। जो पुरुष स्त्रियों से संबंध नहीं रखते, वे मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ते हैं।

सर्वोत्तम है क्षमा
क्षमा के बारे में भगवान महावीर कहते हैं- 'मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूँ। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्रीभाव है। मेरा किसी से वैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूँ। सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा माँगता हूँ। सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ।' भगवान यह भी कहते हैं 'मैंने अपने मन में जिन-जिन पाप की वृत्तियों का संकल्प किया हो, वचन से जो-जो पाप वृत्तियाँ प्रकट की हों और शरीर से जो-जो पापवृत्तियाँ की हों, मेरी वे सभी पापवृत्तियाँ विफल हों। मेरे वे सारे पाप मिथ्या हों।'

धर्म
भगवान महावीर ने धर्म को सबसे उत्तम मंगल बताया है। मन,कर्म और वचन से किसी जीव को दुःख नहीं देना एवं अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। भगवान महावीर कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
 
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