देश के राजाओं के लिए दैवज्ञों की आवश्यकता

डॉ. फणीन्द्र कुमार चौधरी Updated Sun, 12 Jul 2020 06:06 AM IST
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काल ही संसार को सृजन करता है और काल ही संसार के प्रजा का संहार करता है
काल ही संसार को सृजन करता है और काल ही संसार के प्रजा का संहार करता है - फोटो : अमर उजाला

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सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक स्थानानुगामी काल (समय) निरंतर चलता आ रहा है। अर्थात हमारे कालमान के अनुसार भूमण्डल के किसी स्थान में दो दिन के बराबर एक दिन रात्रि, कहीं दो महीनों की और कहीं 6 मासों तुल्य एक दिन रात्रि होती है। प्रायः इस भूमण्डल पर सभी जीव-जन्तु (मनुष्य, पशु-पक्षी, कृमि, कीट-पतंग, लता-गुल्म, वृक्ष-वनस्पति, औषधि-अन्न) आदि एक निश्चित कालखण्ड तक जीवित या दृष्टिगोचर होते रहते हैं। उनका कालखण्ड पूर्ण हो जाने पर अपनी जीर्ण अवस्था को प्राप्त कर एक दिन वे नष्ट हो जाते हैं, परंतु कई घटनाएं आगंतुक होती हैं, वह भी किसी निश्चित कालखण्ड में आकर असामयिक जीव, जन्तुओं को नष्ट कर जाती हैं, जिसका उदाहरण प्राकृतिक आपदाओं के द्वारा जाना जा सकता है। 
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सम्प्रति इसका उदाहरण तूफान, कोरोना आदि है। यहां विचार करने की आवश्यकता यह है कि सब कुछ कालाधीन है। सृष्टि के सभी शुभ अशुभ पदार्थों का रचयिता काल ही है। वह सब जीवों का विनाशकर्ता है। वही उनकी पुनरुत्पत्ति का कारण है। जब जीव सो रहा होता है तब भी काल जगा रहता है। काल के प्रभाव का अतिक्रमण संभव नहीं है। सृष्टि में जो भी पदार्थ पूर्व में थे, भविष्य में भी होंगे और वर्तमान में हैं, वे सब काल द्वारा निर्मित हैं। कर्म मनुष्य के अधिकार में है परंतु कर्म फल नहीं। अंतिम क्षण में मनुष्य काल के प्रभाव के समक्ष पराधीन है। अतः अपना विवेक खोना नहीं चाहिए।
कालः सृजति भूतानि कालः संहरति प्रजाः।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः।। (महाभारत आदि पर्व)

अर्थात् काल (समय) ही संसार को सृजन करता है और काल ही संसार के प्रजा का संहार करता है। काल के बलवान होने पर ही व्यक्ति को इंद्र पद (राजा) बनाता है और काल ही राजा के पद से उतार भी देता है।

काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्मसमाहितः।
कालो हसर्वस्येश्वरोयः पिता{{सीत् प्रजापते:।। अथर्ववेद 19.53.8

अंतिम सत्य ईश्वर प्राप्ति सब का लक्ष्य होता है और होना भी चाहिए। पर परमात्मा का अंश जीवात्मा अपने महत्वाकांक्षा के कारण किस प्रकार इस मायाजाल में फंस जाता है। 
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