बनानी थी शारीरिक दूरी, कर रहे समाज से दूर अमर उजाला लाइव सरसौल महोली गांव

Amarujala Local Bureauअमर उजाला लोकल ब्यूरो Updated Fri, 12 Jun 2020 06:00 PM IST
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Had to make physical distance, but creating social distancing

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आदर्श त्रिपाठी, कानपुर। जीटी रोड से सटे सरसौल ब्लॉक के महोली गांव की बाहरी सड़क से गुजरते हुए हम उन लोगों से मिलने जा रहे थे, जो प्रवासी मजदूर के रूप में अपने घर लौटे और गांव के बाहर ही रोक लिए गए थे। कुछ ग्रामीणों ने हमें बताया था कि गांव के बाहर स्थित तालाब के किनारे बने आंगनवाड़ी केंद्र में बाहर से आए 10 लोगों को क्वारटीन किया गया है। दोपहर की तपती धूप में हमें गांव के तालाब तक का रास्ता बताने वाला भी कोई नहीं था गांव से बाहर जाती सड़क हमें क्वॉरेंटाइन सेंटर तक ले जाएगी इस विश्वास पर हम आगे बढ़ते रहे। करीब एक किलोमीटर चलने पर हमें सामने पानी से लबालब भरा तालाब दिखा। भीषण गर्मी के मौसम में भी पानी से भरे तालाब को देखकर एक सुखद अनुभूति हुई कि गांव के लोगों ने तालाब को उसके मुंह स्वरूप पर बरकरार रखा हुआ है। तालाब के बाहर लगे एक पेड़ की छांव में सुस्त आते हमें तीन व्यक्ति दिखे। वारंटी सेंटर का पता जानने की उम्मीद में हमने उनसे बातचीत शुरू की तो पता चला कि वही प्रवासी मजदूर हैं। क्वॉरेंटाइन सेंटर की गर्मी से परेशान होकर वह पेड़ के नीचे बैठ गए हैं अखबार वालों के आने की जानकारी मिलते ही वह सब हड़बड़ाकर सेंटर की ओर चल दिए। सामने से आती आंगनबाड़ी कार्यकत्री उषा शुक्ला भी उन्हें देखकर बड़बड़ने लगी कि आप लोग क्यों नहीं मानते हो। सेंटर से बाहर क्यों निकल आते हो। उषा शुक्ला ने बताया कि वह केंद्र की सफाई करा रही थी तभी यह लोग बाहर निकल आए। इन सभी की देखरेख की जिम्मेदारी उन पर ही है। देखरेख की पहली अहम बात यही है कि वह सभी सेंटर से बाहर न निकल पाएं। इन बातों के बीच प्रवासी मजदूर सोशल डिस्टेंसिंग बनाते हुए सेंटर के अंदर गए। उनके पीछे हमने भी सेंटर का दरवाजा पार किया। सेंटर में चारों तरफ ताजी कटी घास झाड़ियां गट्ठर के रूप में पड़ी थीं। सेंटर के चार कमरों में 10 श्रमिकों को ठहराया गया था। भीषण गर्मी के कारण वहां मौजूद श्रमिक बाहर बरामदे में बैठे थे। इन प्रवासी श्रमिकों को उनके घरवाले दूर से ही खाना दे जाते हैं। गांव पहुंचने के बावजूद अभी तक उन्हें अपने घर की देहरी देखना नसीब नहीं हुआ है। उस पर गांव वालों का व्यवहार कैसा होगा, भविष्य में क्या करेंगे इसकी भी चिंता इन्हें सताती है। समाज से ही कर रहे दूर सेंटर पर मौजूद श्रमिकों ने बताया कि भले ही वह अपने गांव वापस आए हैं लेकिन सब उनसे अजनबी जैसा व्यवहार कर रहे हैं। कोरोना से बचने के लिए शारीरिक दूरी रखनी होती है। गांव के लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर समाज से ही दूर कर दिया है। मुंबई से लौटे शटरिंग कारीगर कमल सिंह ने बताया कि सेंटर में शौचालय तक नहीं है। सेंटर से बाहर निकलने पर गांव के कुछ लोग बुरा मानते हैं इसका विरोध करते हैं। स्थिति अब इस स्थिति में हम क्या करें समझ में नहीं आता। हाथ से विकलांग कमल सिंह ने बताया कि उनकी चार बेटियां हैं परिवार पालने की मजबूरी में वह गांव छोड़ कर गए थे। अब पता नहीं क्या करेंगे। मुंबई से ही लौटे ललित दिवाकर वहां गाड़ी चलाते थे। गांव में परिवार की चिंता उन्हें यहां खींच लाई। ललित ने बताया कि बेहद परेशानी में वह सेंटर में समय काट रहे हैं। यहां की दीवारों से प्लास्टर भी उखड़ रहा है डर लगता है कि कहीं कोई हादसा ना हो जाए जब लोग घरों के अंदर होते हैं। तभी हम सेंटर से बाहर लगे पेड़ के नीचे बैठ पाते हैं। अंबाला कैंट पंजाब से वापस लौटे रोलिंग मिल के कर्मचारी राहुल अवस्थी ने बताया कि 19 मई को वह निजी बस से गांव लौट रहे थे बस वाले ने लखनऊ से कुछ पहले उतार दिया वह अपनी साइकल साथ लाए थे उसी के जरिए लखनऊ से 23 मई को वह गांव तक पहुंचे। मेडिकल जांच के बाद सेंटर में आ गए। कोरोना से ज्यादा चिंता इस बात की सता रही है कि अब क्या करेंगे। दिल्ली से लौटे राम नारायण पांडेय ने बताया कि वह प्रिंटिंग का काम करते थे। क्वारंटीन सेंटर में रुकने से उन्हें कोई परहेज नहीं है लेकिन यहां कोई सुविधा न होने से परेशानी हो रही है। जिस दिन वह यहां आए थे पूरे परिसर में झाड़ियां घास उगी थी। प बहुत कहने पर इसकी सफाई कराई गई है बाकी कोई यहां देखने नहीं आता कि हम किस परेशानी में हैं। यहां से निकलें तो आगे कुछ करने की सोचेंगे।
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