पूर्वांचल में भी कई 'विकास', राजनीतिक संरक्षण मिलने से पुलिस का नहीं चल पाता है वश

पुष्पेन्द्र कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी Updated Sat, 04 Jul 2020 01:18 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : amar ujala

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कानपुर में गुरुवार की देर रात 60 मुकदमों के आरोपी इनामी बदमाश विकास दूबे के ठिकाने पर पुलिस ने दबिश दी तो हमला कर आठ पुलिसकर्मियों की नृशंस तरीके से हत्या कर दी गई। राजनीतिक संरक्षण और पुलिस की मिलीभगत से पूर्वांचल में भी ऐसे कई 'विकास' हैं, जिन पर पुलिस का वश नहीं चल पा रहा है। कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की शहादत वाराणसी में भ्ज्ञी चौतरफा लोगों के बीच चर्चा का विषय रही। सभी का कहना यही था कि आखिरकार इन 'विकास' को इतना संरक्षण क्यों मिलता है कि ये आठ पुलिसकर्मियों की जान पर भारी पड़ जाएं।
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बनारस में देखें तो 30 सितंबर 2019 को सदर तहसील में दिनदहाड़े बस संचालक की हत्या की गई। सब कुछ शुरुआत से ही स्पष्ट था, इसके बावजूद शूटर चिन्हित करने में पुलिस को आठ महीने का समय लग गया। नौ महीने बीत गए, चिन्हित 50 हजार का इनामी बदमाश गिरधारी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका। गिरधारी पर गंभीर आपराधिक आरोपों में डेढ़ दर्जन से ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं।
थोड़ा और पीछे देखें तो एमएलसी बृजेश सिंह से अदावत के लिए चर्चित एक लाख का इनामी बदमाश इंद्रदेव सिंह बीते सात-आठ साल से पुलिस के लिए चुनौती बना है। एक लाख का इनामी बदमाश दीपक वर्मा भी कई वर्षों से लगातार पुलिस से लुकाछिपी खेल रहा है। बाकी, वर्षों से कुख्यात कुछ बदमाशों की बात ही करना बेमानी है।
दो लाख के इनामी बदमाश अताउर रहमान उर्फ बाबू उर्फ सिकंदर व सहाबुद्दीन, विश्वास नेपाली, मनीष सिंह जैसे 15 से ज्यादा ऐसे कुख्यात बदमाश हैं, जिन पर वर्षों से पुरस्कार घोषित है और जिले की पुलिस, क्राइम ब्रांच या एसटीएफ को यह भी नहीं पता है कि वह जिंदा हैं या उनकी मौत हो गई है। इन कुख्यात बदमाशों की गिरफ्तारी न होना पुलिस की कार्यशैली और सिस्टम पर एक गंभीर सवाल हैं। इसके साथ ही यह कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती भी है।

कुछ पर कसता ही जा रहा शिकंजा, कुछ आरोपों से मुक्त

बनारस और खासतौर से पूर्वांचल में लगभग तीन दशक से ज्यादा समय से एमएलसी बृजेश सिंह और एमएलए मुख्तार अंसारी का गिरोह सुर्खियों में रहा। दोनों गिरोहों को लेकर राजनीतिक संरक्षण और पुलिस की मिलीभगत के आरोप लगातार लगते रहे। हालांकि, एमएलसी बृजेश के खिलाफ दर्ज मुकदमों की संख्या अब कम रह गई है और ज्यादातर मामलों में वह बरी हो चुके हैं।

इसके साथ ही बृजेश या उनके गिरोह का नाम भी हाल के वर्षों में किसी वारदात में सामने नहीं आया। वहीं, एमएलए मुख्तार और उनके गिरोह से जुड़े लोगों पर पूर्वांचल दिनोंदिन शिकंजा कसता ही चला जा रहा है। इसी कड़ी में पूर्व एमएलसी विनीत सिंह का नाम भी कभी सुर्खियों में रहा करता था, लेकिन अब उनका नाम भी जरायम जगत से जुड़ी घटनाओं में सुनाई नहीं देता है। जबकि, पूर्व सांसद धनंजय सिंह बीते महीने ही एक आपराधिक मामले में जेल भेजे गए थे। कुछ ऐसा ही हाल आजमगढ़ और भदोही का भी है।
 
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