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अर्जुन ने अजगर का वध कर नहुष को दिलाई मुक्ति

Dehradun Bureauदेहरादून ब्यूरो Updated Mon, 17 Feb 2020 10:18 PM IST
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महाभारत के अंश नहुष: एक अजगर की कथा नाटक का कलाकारों ने भावपूर्ण मंचन किया। लोकनाथ थियेटर ग्रुप के कलाकारों ने अभिषेक बहुगुणा के निर्देशन में अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया। नाटक में नहुष का विकराल रूप, दुर्योधन का षड़यंत्र और नहुष व अर्जुन के बीच युद्ध के दृश्यों ने दर्शकों का ध्यान खींचा।
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गढ़वाल क्षेत्र की लोककथाओं पर आधारित महाभारत कालीन घटना नहुष (एक अजगर की कथा) का युवा नाटककार कमल रावत ने नाट्य रुपांतरण किया है। नहुष का कथानक महाकाव्य महाभारत का आधिकारिक प्रसंग नहीं है, बल्कि यह गढ़वाल क्षेत्र में स्थानीय गायन और जनश्रुतियों पर आधारित है। इसी को पहली बार रंगमंच में नाटक के रूप में रविवार देर शाम गढ़वाल विवि के लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र चौरास के प्रेक्षागृह में प्रस्तुत किया गया।
कथानक के अनुसार जुए में सब कुछ हारने के बाद पांडव दुर्योधन के दास हो चुके थे। कुछ दिन बाद उन्हें 12 वर्ष के वनवास व एक वर्ष के अज्ञातवास में जाना है। इस अवधि में दुर्योधन पांडवों को प्रताड़ित और लज्जित करने के लिए धर्मराज को छोड़ अन्य पांडवों को बारी-बारी अपने रंग महल की रात्रि पहरेदारी पर लगाता है। दरअसल वह गुप्त रूप से एक इच्छाधारी अजगर (नहुष) द्वारा स्वयं और अपनी पत्नी भानुमति को प्रताड़ित होने से बचाने का उपाय कर रहा था। दुर्योधन अर्जुन को अजगर से निजात दिलाने के बदले दासत्व से मुक्ति का प्रलोभन देता है। जब श्रीकृष्ण को इसकी जानकारी मिलती है, तो अर्जुन को यह रहस्य बताते हैं कि वह अजगर और कोई नहीं कौरव-पांडवों के पूर्वज धर्मात्मा महाराज नहुष है। उन्होंने अपने तप और सत्कर्मों बल पर स्वर्ग में इंद्रपद पाया था, लेेकिन उन्होंने भोग विलास में डूबकर सप्तऋषियों का अपमान कर दिया। इस वजह से उन्होंने स्वर्ग का राज्य गंवा दिया। साथ ही अगस्त्य ऋषि ने उन्हे हजार वर्ष तक पृथ्वी पर सर्पयौनि भोगने का श्राप दिया।
अर्जुन भी जान जाते हैं कि नहुष दुर्योधन का विनाश कर देगा, लेकिन वह अपनी भाभी भानुमति की अस्मिता की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण की सलाह की अवहेलना कर नहुषफ से युद्ध का निर्णय लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से अर्जुन युद्ध में नहुष का वध कर उन्हे सर्पयौनि से मुक्ति दिला देते हैं, लेकिन दुर्योधन अपने वादे से मुकरते हुए पांडवों का वनवास भोगने की आज्ञा दे देता है।
नाटक के प्रमुख संवाद
काल के हाथ कमान, बुढ़ा छोड़े न जवान
आनंदा में बर्सति बर्सति, नो में दुखम नो में दुखम
अगर बिना आभूषण के शचि इतनी खूबसूरत है तो आभूषणों में सौंदर्य कितना मोहक होगा?
ये थे पात्र
अरविंद टम्टा (नहुष), शशांक जमलोकी (अर्जुन), अंकित रावत (श्रीकृष्ण), मनोजकांत उनियाल (दुर्योधन), काजल मेहरा (द्रोपदी), विकास रावत (इंद्र), पूजा कुमारी (शचि), योगेश (युधिष्ठिर), पीयूषमणि (भीम), रोहित (नकुल), अजय (सहदेव), अंकुर पांडे (अगस्त्यऋषि), बकुल वर्मा (नर्तकी), लव मैठाणी (ऋषि), अंकित उछोली (सेवक) और रघुवीर कंडारी व शैलेंद्र जुयाल (देवगण)।
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