क्या दर्दनिवारक दवा आइबूप्रोफेन से हो सकता है कोरोना का इलाज?

वर्ल्ड डेस्क, लंदन। Updated Thu, 04 Jun 2020 04:59 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

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पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस वायरस का इलाज ढूंढने के भी प्रयास काफी तेजी से चल रहे हैं। इस बीच लंदन में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिक यह पता लगाने के लिए परीक्षण कर रहे हैं कि क्या आम दर्द निवारक और सूजन-रोधी दवा आइबूप्रोफेन कोविड-19 के मरीजों के इलाज में मदद कर सकती है? क्या यह मरीजों की श्वसन संबंधी समस्या को घातक होने से रोक सकती है?
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लंदन के गायज अस्पताल, सेंट थॉमस अस्पताल और किंग्स कॉलेज के शोधकर्ताओं की एक टीम इसी बात को लेकर परीक्षण कर रही है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वह यह जानना चाहते हैं कि क्या दर्द निवारक दवा आइबूप्रोफेन का उपयोग कोरोना वायरस के मरीजों के इलाज के लिए किया जा सकता है? क्या यह उनकी सांस संबंधी तकलीक को कम कर सकती है और मरीजों को वेंटिलेटर पर ले जाने से रोक सकती है?
बता दें कि दुनिया भर में लगभग 180 देशों में कोविड-19 महामारी के कारण हो मौतों के बीच वैज्ञानिक और शोधकर्ता इसका सस्ता उपचार खोजने की कोशिश में जुटे हुए हैं। इसके साथ ही वह कम लागत वाले उपचार से अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं पर बोझ कम करने और रोगियों को वेंटिलेटर की जरूरत नहीं पड़ने जैसे उपायों पर भी काम कर रहे हैं।
बहरहाल, लंदन में जारी अध्ययन में आइबूप्रोफेन के एक अन्य प्रकार फ्लारिन को शामिल किया गया है। यह यूनाइटेड किंगडम में उपलब्ध है। साथ ही आइबूप्रोफेन के मानक संस्करण से इसकी रासायनिक संरचना थोड़ी अलग है। इस अध्ययन के लिए गायज अस्पताल और सेंट थॉमस एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट, किंग्स कॉलेज लंदन और एसईईके एक ड्रग-रिसर्च फर्म माध्यम से एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। 

यदि यह परीक्षण सफल होता है तो यह कोविड-19 महामारी के दौरान दवा की खोज की दिशा को बदल सकता है। इस परीक्षण को लिबरेट नाम दिया गया है, इसे तब शुरू किया गया जब इस बात का पता चला कि इस दवा से जानवरों में तीव्र श्वसन सिंड्रोम से जुड़ी जटिलता में से एक का इलाज हो सकता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार इस परीक्षण के दौरान कुछ मरीजों को सामान्य मानक उपचार दिया जाएगा, जबकि कुछ मरीजों को मानक उपचार के साथ अतिरिक्त दवाएं दी जाएंगी। सामान्य मानक उपचार वाले मरीजों को लगातार ऑक्सीजन भी दी जाएगी।

शोधकर्ता दल से जुड़े और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) ट्रस्ट में गहन देखभाल चिकित्सा के प्रोफेसर रिचर्ड बीले ने कहा कि कोविड-19 एक नई बीमारी है। इसलिए इसके उपचार के सीमित विकल्प मौजूद हैं। हमारा परीक्षण इस बात का आकलन करेगा कि क्या पहले से मौजूद कोई दवा मरीजों को राहत दे सकती है। शोध दल के सदस्य प्रोफेसर मितुल मेहता ने कहा कि यह परीक्षण केवल अस्पताल में भर्ती मरीजों पर किया गया, हल्के लक्षण वालों पर नहीं।

बता दें कि फ्रांस के स्वास्थ्य मंत्री ओलिवियर वेरन ने मार्च में कहा था कि कोविड-19 वाले रोगियों को आइबूप्रोफेन जैसी दवाओं से बचना चाहिए, क्योंकि यह संक्रमण को बढ़ा सकती है। हालांकि यूरोप के शीर्ष दवा नियामक ने कुछ ही समय बाद कहा था कि आइबूप्रोफेन से कोरोना के मरीजों को नुकसान होता है, इस बात के कोई ठोस सबूत नहीं हैं।

एक बार परीक्षण के ठोस नतीजे सामने आने के बाद तय हो जाएगा कि यह दवा कोरोना के मरीजों के इलाज में कारगर है या नहीं। बता दें कि इससे पहले ब्रिटेन में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) ने मार्च में अपनी वेबसाइट पर अपलोड की गई आइब्रूफेन से जुड़ी एक सलाह को वापस ले लिया था। इसमें कहा गया था कि कोरोना के हल्के लक्षण वाले मरीजों को इलाज के तौर पर आइब्रूफेन दी जा सकती है।
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