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भोपाल

सोमवार, 30 मार्च 2020

ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने को बताया होली का उपहार

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा ज्वाइन करने को पार्टी नेताओं ने होली का उपहार बताया है। दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा द्वारा ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा की सदस्यता दिलाने के बाद भाजपाइयों ने कीडगंज कार्यालय में शाम को बैठक की। बैठक में ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य सभा सदस्य का उम्मीदवार बनाए जाने पर खुशी जताई गई।

महानगर अध्यक्ष गणेश केसरवानी की अध्यक्षता में संपन्न हुई बैठक में कहा गया कि मध्य प्रदेश कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े जनाधार वाले नेता ने कांग्रेस में चल रही तानाशाही से ऊब कर कुशल संगठन शिल्पी भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के समक्ष पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ली। सदस्यता ग्रहण करते ही भाजपा द्वारा ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा का टिकट देकर सबका सम्मान और सबका विश्वास वाले प्रतिबद्धता को निभाया है।

महानगर अध्यक्ष गणेश केसरवानी ने कहा कि ज्योतिराज सिंधिया ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए सीएए का समर्थन कर अपने राष्ट्रवादी होने का संकेत कुछ दिन पूर्व ही दे दिया था। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की हम सभी कार्यकर्ता उनका स्वागत और अभिनंदन करते हैं।

यह भी कहा कि सिंधिया ने भाजपा सदस्यता ग्रहण कर भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ताओं को होली का उपहार दिया है। बैठक में कुंज बिहारी मिश्रा, देवेश सिंह, रमेश पासी, रवि केसरवानी, बृजेश मिश्रा, गिरिजेश मिश्रा, राजू पाठक, प्रमोद जायसवाल, अनिल केसरवानी, पवन श्रीवास्तव, आयुष अग्रहरी, विवेक अग्रवाल, आशीष गुप्ता, राजेश निषाद आदि मौजूद रहे।
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शिवराज सिंह शिवराज सिंह

मध्यप्रदेश : सीएम पद की दौड़ में हैं तोमर, शिवराज और नरोत्तम के नाम, भाजपा आज ले सकती है फैसला

मध्यप्रदेश से कमलनाथ सरकार की विदाई के बाद राज्य में सरकार की ताजपोशी के सवाल पर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है।  उम्मीद की जा रही है कि भाजपा शनिवार को इस पर फैसला ले लेगी। राज्य के नए सीएम के पद की रेस में पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और नरोत्तम मिश्रा शामिल हैं। अब तक इस पद के लिए शिवराज को सबसे प्रबल दावेदार बताया जा रहा है, हालांकि पार्टी में दूसरे विकल्पों पर भी विचार हो रहा है।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सभी को स्वीकार नेता नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की पहली पसंद केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर हैं। भाजपा के नेता नरोत्तम मिश्रा की भी महत्वाकांक्षा है और उनके शुभ चिंतकों की कमी नहीं है। भाजपा में राज्य के मुख्यमंत्री को लेकर अब हलचल काफी तेज है। अब तक इस पद के लिए शिवराज को सबसे प्रबल दावेदार बताया जा रहा है, हालांकि पार्टी में दूसरे विकल्पों पर भी विचार हो रहा है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया की इस पद के लिए पहली पसंद शिवराज सिंह चौहान हैं। दरअसल वह नहीं चाहते कि ग्वालियर संभाग का कोई नेता सीएम बने। तोमर और मिश्रा इसी संभाग से हैं। चूंकि भाजपा को राज्य में बड़ा बहुमत हासिल नहीं है, इसलिए सिंधिया की राय के उलट फैसला लेना मुश्किल है। हालांकि अगर शिवराज की जगह तोमर या नरोत्तम आलाकमान की पसंद बने तो नेतृत्व इस संबंध में पहले सिंधिया को राजी करेगा।

जहां तक सीएम पद की बात है तो केंद्रीय मंत्री तोमर और नरोत्तम मिश्रा भी इसके मजबूत दावेदार हैं। तोमर पीएम के करीबी हैं तो नरोत्तम गृह मंत्री अमित शाह के। सूत्रों का कहना है कि तोमर या मिश्रा को अगर सीएम बनाने का फैसला होता है तो शिवराज केंद्रीय राजनीति में आएंगे। ऐसी स्थिति में उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी और उन्हें कृषि मंत्रालय दिया जा सकता है।
 

शिवराज के सिवा आखिर कौन?

भाजपा के एक राज्यसभा सांसद का कहना है कि शिवराज को ही मुख्यमंत्री बनना चाहिए। उनकी जानकारी के मुताबिक तैयारी भी इसी तरह की हैं। बताते हैं मध्यप्रदेश  में सबको स्वीकार तो नहीं लेकिन अधिकतम को स्वीकार नेता शिवराज सिंह ही हैं। राज्य में भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राकेश सिंह, राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का रास्ता थोड़ा अलग हैं।

बताते हैं हाल में भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया से अभी स्थानीय स्तर पर नेता कोई राय नहीं ले रहे हैं। हालांकि इसमें ज्योतिरादित्य की राय मायने रखेगी। समझा जा रहा है कि ज्योतिरादित्य इसकी चर्चा केंद्रीय नेतृत्व से कर रहे हैं।

शिवराज के रास्ते में सबसे बड़ा कांटा उनका 13 साल तक राज्य का मुख्यमंत्री रहना है। यह अनुभव के लिहाज से ठीक है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व हमेशा नए नेताओं को अवसर देने और भविष्य का नेता तैयार करने को प्रमुखता देता है।

नरेंद्र तोमर भी क्या बुरे हैं?

केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर अच्छे नेता हैं। जमीनी पकड़ रखते हैं। सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी क्षमता को पसंद करते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को भी तोमर के नाम को लेकर कोई आपत्ति नहीं है।

मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाएं कैलाश विजयवर्गीय भी रखते हैं, लेकिन माना जा रहा है कि तोमर के नाम पर उन्हें या फिर राकेश सिंह को कोई आपत्ति नहीं होगी। शीर्ष नेतृत्व हमेशा नए नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के पक्ष में रहता है। दूसरे, शीर्ष नेतृत्व को हमेशा केंद्र सरकार में अनुभवी लोगों की आवश्यकता रहती है।

नरोत्तम मिश्रा अच्छे उत्साही नेता हैं

नरोत्तम मिश्रा ब्राह्मण चेहरा हैं और राज्य में ब्राह्मण चेहरा लंबे समय से सत्ता में नहीं है। भाजपा का अच्छा जनाधार है, लेकिन नरोत्तम अभी इस दौड़ में पीछे हैं। उनके सहयोगी भी इस बारे में बहुत उत्साह से कुछ नहीं कह पाते।

भिंड, मुरैना में नरोत्तम मिश्रा अपनी पकड़ रखते हैं। नरोत्तम नहीं चाहते ग्वालियर चंबल संभाग से उनका प्रभाव किसी तरह से कम हो पाए। नरोत्तम ज्योतिरादित्य को बहुत पसंद नहीं कर रहे हैं। भाजपा को अभी सबके बीच में एक समीकरण बनाना है।

शनिवार को तय हो जाएगा नेता का नाम

भाजपा के एक वरिष्ठ सूत्र का कहना है कि राज्य के नए नेता का एलान शनिवार को सुबह तक हो सकता है। बताते हैं अभी राज्य में विधायकों का मन टटोलने की प्रक्रिया चल रही है।

भाजपा नेता मानकर चल रहे हैं कि मध्यप्रदेश में सरकार बनाने का रास्ता तो आसान है, लेकिन सरकार के कार्यकाल को पूरा कर पाने का रास्ता कठिन है। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व भी संभल कर कदम रख रहा है।
 
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कमलनाथ के इस्तीफे के एलान के बाद भाजपा के लिए आसान नहीं होगी आगे की चुनौतियां

ज्योतिरादित्य सिंधिया का साथ छोड़ना कांग्रेस नहीं संभाल पाई और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट का फ्लोर टेस्ट का निर्णय और सिंधिया समर्थक 16 विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति के मंजूर किए जाने के बाद कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ के इस्तीफा देने की संभावना जता दी थी।


दिग्विजय सिंह ने कह दिया था कि उनके पास बहुमत नहीं है, लेकिन कमलनाथ के इस्तीफा देने के बाद भाजपा और शिवराज सिंह चौहान के लिए राज्य में सरकार बनाना, चलाना बहुत आसान नहीं होगा।

राजनीति में कल और परसों भी आता है : कमलनाथ

कमलनाथ ने इस्तीफा देने से पहले अपनी 40 साल की भरोसे की राजनीति का हवाला दिया और कहा कि राजनीति में आज के बाद कल और परसों भी आता है। उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया के धोखे और सौदेबाजी की राजनीति पर भी निशाना साधा। उन्हें भाजपा के सौदेबाजी की राजनीति को भी आड़े लिया और अंत में राज्यपाल को इस्तीफा देने की घोषणा कर दी।

इससे पहले भाजपा के विधायक शरद कौल ने भी विधानसभा में सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। विधानसभा अध्यक्ष ने कौल का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। कांग्रेस पार्टी के खेमे में कौल समेत करीब तीन-चार विधायकों के कमलनाथ सरकार का साथ देने की उम्मीद थी।

लेकिन सूत्र बताते हैं कि ताजा घटनाक्रम का विश्लेषण करने के बाद कमलनाथ से इस्तीफा देने का मन बना लिया। उन्होंने इसके बाबत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने टेलीफोन पर चर्चा की और इसके बाद प्रेसवार्ता में इसकी घोषणा कर दी।




कहां हुए फेल, कहां हुए पास

कमलनाथ को मध्य प्रदेश में पार्टी की जिम्मेदारी से लेकर मुख्यमंत्री का पद मिलना कांटों भरा था। उनके रास्ते में हर पग पर सबसे बड़ा कांटा ज्योतिरादित्य सिंधिया थे। कमलनाथ के साथ जहां मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और कुछ सीनियर नेताओं का हौसला था।

इसके सहारे कमलनाथ 38 साल की केंद्रीय राजनीति करने के बाद 2018 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए। कमलनाथ के सामानांतर ज्योतिरादित्य सीधे राहुल, प्रियंका तक सीधी पहुंच रखते थे।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक भी उनकी बेधड़क पहुंच थी। कांग्रेस पार्टी के भीतर भी माना जा रहा है कि कमलनाथ ज्योतिरादित्य और दिग्विजय के बीच में समीकरण नहीं बना पाए। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तीनों नेताओं को नहीं संभाल पाया।

लोकसभा चुनाव 2019 हारने के बाद ज्योतिरादित्य लगातार दबाव की राजनीति करते रहे और इससे इतर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह सत्ता में चाल में चल रहे थे। शीर्ष स्तर के सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफा देने के बाद ज्योतिरादित्य लगातार दबाव बढ़ाते रहे। अक्टूबर-नवंबर 2019 में उन्होंने संकेत देना शुरू किया, जनवरी और फरवरी 2020 में सभी दांव अजमाने के बाद वह भाजपा में चले गए।

बागी विधायकों से एक भेंट पर टिकी थी कांग्रेस की उम्मीद

गुलाम नबी आजाद ने पिछले सप्ताह कहा था कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बच पाई तो केवल कमलनाथ बचा पाएंगे। हालांकि आजाद को इसकी संभावना कम थी। दिग्विजय सिंह कमलनाथ की सरकार गिरने का दाग अपने ऊपर नहीं लेना चाहते थे। हालांकि पार्टी के तमाम नेता इसकी मुख्य वजह उन्हें ही मानते हैं।

इसके सामानांतर कमलनाथ और दिग्विजय दोनों को उम्मीद थी कि बागी विधायकों से एक भेंट के बाद समीकरण बदल जाएगा। इसी उम्मीद में कोरोना वायरस संक्रमण का सहारा लेकर मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष ने 26 मार्च तक विधानसभा की कार्यवाही को स्थगित कर दिया था।

बागी विधायकों से भेंट के लिए कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने हर स्तर पर प्रयास किया, लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों ने ज्योतिरादित्य, शिवराज, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के सहयोग से इसे सफल नहीं होने दिया। सुप्रीम कोर्ट के 20 दिसंबर को फ्लोर टेस्ट के निर्णय ने भी कमलनाथ का हाथ बांध दिया।

ऑपरेशन लोटस सफल लेकिन आसान नहीं होगी राह

कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश में भाजपा का ऑपरेशन लोटस सफल रहा। यहां कर्नाटक की तरह कई बार प्रयास नहीं करने पड़े और राहुल गांधी के दाहिने हाथ कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के सहयोग से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा, नरोत्तम मिश्रा ने इस लक्ष्य को आसानी से साध लिया।

कमलनाथ के इस्तीफा देने के बाद भाजपा नेता शिवराज सिंह चौहान राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं। माना जा रहा है कि राज्य के अगला मुख्यमंत्री वही बनेंगे। इस बारे में अंतिम निर्णय शीर्ष नेतृत्व को ही करना है। हालांकि शिवराज को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लेकर भी भाजपा के भीतर काफी अंतर्विरोध है। भाजपा के मुख्यमंत्री को शपथ लेने के बाद सदन में बहुमत भी साबित करना है। माना जा रहा है कि यहां भी भोपाल में राजनीति नया रंग दिखा सकती है।

केंद्र में ज्योतिरादित्य बनेंगे मंत्री और 22 पूर्व विधायक लड़ेंगे चुनाव

ज्योतिरादित्य सिंधिया के राज्यसभा के लिए चुनकर आने के बाद उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री बनाए जाने की संभावना है। ज्योतिरादित्य को ऊर्जा मंत्रालय का प्रभार दिया जा सकता है और संसद का बजट सत्र समाप्त होने के बाद कभी केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल, विस्तार संभव है। भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आए विधायकों के साथ कर्नाटक फार्मूले पर आगे बढ़ेगी।

ज्योतिरादित्य समर्थक सभी 22 विधायकों का विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने इस्तीफा मंजूर कर लिया है। सूत्र बताते हैं कि ये सभी विधायक अब भाजपा के टिकट पर उप चुनाव के जरिए विधानसभा में चुनकर आएंगे। चुनकर आने के बाद इनमें से नौ विधायकों को मंत्री पद मिल सकता है।
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सरकार बचाने के लिए वैधानिक कदम उठाएंगे कमलनाथ, कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने संभाली कमान

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि रविवार को मध्यप्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन द्वारा मुख्यमंत्री कमलनाथ को बहुमत परीक्षण के लिए लिखी गई चिट्ठी असंवैधानिक थी। इसके उत्तर में सीएम कमलनाथ ने भी राज्यपाल को चिट्ठी लिखकर जवाब दिया है। इसी बीच मंगलवार को भाजपा के बहुमत परीक्षण कराने के निर्देश देने वाली याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने बुधवार तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी है।

कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने संभाली कमान

कांग्रेस नेता, पूर्व राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा खासतौर पर कमलनाथ को कानूनी सलाह दे रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी भी पूरे प्रकरण में कमलनाथ के सबसे भरोसेमंद कानूनी सलाहकार के रूप में काम कर रहे हैं।

भाजपा भी पीछे नहीं

दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, नरेंद्र सिंह तोमर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान, वीडी शर्मा, नरोत्तम मिश्रा और कैलाश विजयावर्गीय भी लगातार सक्रिय हैं। भाजपा सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की कानूनी राय के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं।

राज्यपाल भी कानूनी सलाह मशविरा करके ही कदम उठा रहे हैं। भाजपा नेताओं ने राज्यपाल के सामने अपने 106 विधायको की परेड कराने के बाद उन्हें वापस हरियाणा लाने की योजना बनाई है।

कांग्रेस पार्टी फिलहाल अपने पत्ते नहीं खोल रही है। अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष संविधन सम्मत कदम उठाएंगे। समझा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में इस मामले पर सुनवाई का इंतजार है।

कैसे करें बहुमत परीक्षण?

कांग्रेस पार्टी का कहना है कि विपक्ष ने न तो विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव दिया है और न ही उसने अपने पास बहुमत होने की जानकारी दी है। फिर कैसे बहुमत साबित करने का फैसला लिया जा सकता है।

सिंघवी का कहना है कि राज्यपाल मुख्यमंत्री को विधानसभा में अपना विश्वास परीक्षण साबित करने के लिए समय और तारीख तय नहीं कर सकते। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यपाल लालजी टंडन भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं।

ऐसी चर्चा है कि 26 मार्च तक विधानसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद भाजपा ने विधायकों को गुड़गांव भेजने का निर्णय लिया है।

क्या हैं विकल्प

विधानसभा अध्यक्ष के पास तीन विकल्प हैं। पहला, वो सरकार का शक्ति परीक्षण करा सकते हैं। दूसरा, वह विधायकों का इस्तीफा मंजूर कर सकते हैं। तीसरा, विधायकों को अयोग्य करार दे सकते हैं।

राज्यपाल लोकतंत्र की मर्यादा की रक्षा का सहारा लेकर अपने संवैधानिक अधिकार का उपयोग कर सकते हैं। वह राज्य सरकार और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा जानबूझकर विश्वासमत परीक्षण टालने की कार्रवाई मानते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं।
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