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इस कंपनी में हर कोई कमाता है 50 लाख रुपये सालाना, मालिक खुद लेता है कम वेतन

फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 26 Mar 2020 05:22 PM IST
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ग्रेविटी पेमेंट्स के फाउंडर और सीईओ डैन प्राइस और कंपनी के कर्मचारी
ग्रेविटी पेमेंट्स के फाउंडर और सीईओ डैन प्राइस और कंपनी के कर्मचारी - फोटो : Facebook/Gravity Payments
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2015 में अमेरिका के सिऐटल की एक कार्ड पेमेंट्स कंपनी के बॉस ने अपने 120 कर्मचारियों के लिए 70 हजार डॉलर यानी लगभग 50 लाख रुपये का न्यूनतम वेतन तय किया। ऐसा करने के लिए कंपनी के बॉस ने अपनी आय से 10 लाख डॉलर यानी करीब सात करोड़ कम कर कर दिए। पांच साल हो चुके हैं और यह जनाब अभी भी कम वेतन ले रहे हैं। डैन प्राइस नाम के इन जनाब का कहना है कि पांच साल पहले जो जुआ उन्होंन खेला था, वह फायदेमंद रहा। 
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डैन अपनी दोस्त वैलेरी के साथ सिऐटल के पास पहाड़ों की सैर कर रहे थे। तभी उनकी दोस्त ने ऐसी बात बताई जिससे वह परेशान हो गए। चलते-चलते वैलेरी ने उन्हें बताया कि कैसे उनकी जिंदगी जंजाल बनी हुई है। उनके मकान मालिक ने किराया 200 डॉलर बढ़ा दिया है और वह रोजमर्रा के खर्च पूरे नहीं पड़ रहे। इससे प्राइस नाराज हो गए। वैलेरी को उन्होंने एक बार डेट भी किया था। वह 11 साल सेना में रही थीं और दो बार इराक में तैनात रह चुकी थीं। अभी वह जीवन यापन के लिए हफ्ते में 50 घंटे काम कर रही थीं और उन्हें दो जगहों पर काम करना पड़ रहा था। 
प्राइस कहते हैं, 'वह ऐसी हैं कि सेवा, सम्मान और परिश्रम ही उनके व्यक्तित्व को परिभाषित करता है।' वैलेरी हर साल 40 हजार डॉलर यानी लगभग 29 लाख रुपये कमा रही थीं, मगर सिऐटल में वह अपने लिए ढंग का मकान नहीं ले पा रही थीं। प्राइस नाखुश हुए कि दुनिया में कितनी विषमता है। अचानक उन्हें अहसास हुआ कि वह खुद भी तो इसी समस्या का हिस्सा हैं। 31 साल की उम्र में प्राइस करोड़पति बन गए थे। उनकी कंपनी ग्रैविटी पेमेंट्स के 2000 के आसपास ग्राहक हैं और इसकी कीमत लाखों डॉलर है। इस कंपनी को उन्होंने तब बनाया था जब वह किशोर थे। 
प्राइस साल में 1.1 मिलियन डॉलर (लगभग आठ करोड़ रुपये) कमा रहे थे, मगर उनकी दोस्त वैलेरी के कारण उन्हें अहसास हुआ कि उनके स्टाफ के लोग भी तो संघर्ष कर रहे होंगे। उन्होंने इन हालात को बदलने का फैसला किया। डैन प्राइस काफी सकारात्मक और विनम्र हैं मगर अमेरिका में वह विषमता के खिलाफ उठने वाली सबसे सशक्त आवाजों में से एक हैं।

वह कहते हैं, 'लोग भूख से जूझ रहे हैं, नौकरियों से निकाले जा रहे हैं या फिर शोषण का सामना करना कर रहे हैं। सिर्फ इसलिए ताकि किसी को न्यूयॉर्क के किसी ऊंचे टावर में आलीशान अपार्टमेंट मिल सके, जहां वह सोने की कुर्सी पर आराम फरमा सके। हम अपने समाज, अपनी संस्कृति में लालच को बढ़ावा दे रहे हैं। फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची इसका सबसे खराब उदाहरण है। बिल गेट्स ने जेफ को पछाड़कर सबसे अमीर आदमी का तमगा हासिल कर लिया है तो किसी को क्या फर्क पड़ता है?' 
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