अर्थव्यवस्था को गति देने का रोडमैप, कोरोना महामारी ने गंभीर रूप से किया प्रभावित

b.k chaturvediबी. के. चतुर्वेदी Updated Mon, 26 Oct 2020 07:20 AM IST
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भारतीय अर्थव्यवस्था (प्रतीकात्मक तस्वीर)
भारतीय अर्थव्यवस्था (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

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वैश्विक कोरोना महामारी ने विश्व आर्थिक व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। छह से आठ महीनों के दौरान दस लाख से ज्यादा लोग मर गए हैं। वैश्विक जीडीपी में इतनी गिरावट आई है, जितनी पहले कभी नहीं आई थी और दसियों लाख लोग फिर गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं। महामारी के खत्म होने के फिलहाल कोई संकेत नहीं हैं। कई बार उम्मीद जगी, पर महामारी की ताजा लहरों ने इसे झुठला दिया।
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अब जब ऐसे संकेत हैं कि यह वायरस कम खतरनाक है और भारत में रोज संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या घट रही है, तब फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और अन्य यूरोपीय देशों में इसके दोबारा जोर पकड़ने के संकेत दिख रहे हैं। दक्षिण अमेरिका में ब्राजील, पेरु, अर्जेंटीना, वेनेजुएला और कंबोडिया जैसे कुछ देश अब भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
भारत ने वायरस के प्रसार को रोकने के लिए यथोचित रूप से बेहतर काम किया है।
हालांकि हमारे यहां सत्तर लाख से अधिक लोग इस बीमारी से प्रभावित हुए, लेकिन उनमें से 89 फीसदी स्वस्थ होकर अपने घर लौट गए। वैश्विक तुलना में यह संतोषजनक है, क्योंकि वैश्विक रिकवरी रेट 75 फीसदी है। मृत्यु दर भी वैश्विक औसत की तुलना में यहां कम है। वैश्विक स्तर पर इससे पीड़ित 2.7 फीसदी लोग नहीं बच पाए, जबकि हमारे यहां यह आंकड़ा 1.5 फीसदी है। हालांकि जब लॉकडाउन की घोषणा की गई थी, तब हम घर से दूर या दूसरे राज्यों में बड़े पैमाने पर काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों के लिए सही ढंग से योजना नहीं बना पाए। कुछ लोगों के लिए यह विनाशकारी था। लॉकडाउन के नियमों के कारण समस्या ज्यादा जटिल हो गई, जिसे सभी राज्यों में पुलिस की सहायता
से एक समान लागू नहीं किया गया। अब जब हम मामलों में कमी आते देख रहे हैं, तब इस वायरस से जुड़ी अनिश्चितता योजना को कठिन बना रही है। अगले साल की पहली छमाही में टीके की उपलब्धता की संभावना हममें उम्मीद जगा रही है।

महामारी ने हमारी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। हालांकि यह बीमारी अब भी हमारे देश में व्याप्त है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था को महामारी से लगे झटके से उबारने के लिए उचित योजना बनाने का यही वक्त है। पहले यह संकेत था कि अर्थव्यवस्था में 3.7 फीसदी गिरावट आएगी, लेकिन नए अनुमान से संकेत मिलता है कि हमारी जीडीपी 10.2 फीसदी तक नीचे जा सकती है।

इसकी तुलना में वैश्विक अर्थव्यवस्था के छह फीसदी तक गिरावट का अनुमान था, जिसके अब मात्र 4.5 फीसदी रहने का अनुमान है। चीन की अर्थव्यवस्था संकुचन के बजाय सकारात्मक वृद्धि दर्शाएगी। अमेरिकी अर्थव्यवस्था और यूरोपीय ओईसीडी देशों में पहले के अनुमान की तुलना में कम गिरावट आएगी। इस आर्थिक मंदी का एक दिलचस्प नतीजा आईएमएफ-वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक के अनुसार यह है कि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी चार फीसदी बढ़कर 2020 में 1,888 डॉलर हो सकती है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी घटकर 1,877 डॉलर हो सकती है, जो बांग्लादेश से कम है।

हालांकि स्थिति 2021 में उलट सकती है, जब भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 8.2 फीसदी बढ़कर 2,030 डॉलर होने की उम्मीद है, जबकि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी 5.4 फीसदी बढ़कर 1,990 डॉलर होने का अनुमान है। यदि भारत को अपनी आर्थिक मजबूती फिर से हासिल करनी है और तीस खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था की राह पर चलना है, तो कई उपाय करने की जरूरत है। पहला, लॉकडाउन काफी लंबा चला है, फिर भी अगर कोरोना से जंग नहीं जीती गई है, तो यह महत्वपूर्ण है कि हम दूसरे उपायों-मास्क लगाने, शारीरिक दूरी बनाए रखने और नियमित रूप से हाथ धोने-पर ध्यान केंद्रित करें। इसे लंबे समय तक जारी रखा जा सकता है, जब तक कि लोगों को टीका उपलब्ध न हो जाए। दीर्घकालीन अर्थों में यह अर्थव्यवस्था के लिए कम विनाशकारी है और सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में आवश्यक हो सकता है।

दूसरा, सरकार द्वारा पहले दिया गया राजकोषीय प्रोत्साहन अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में बहुत सफल नहीं रहा है। मांग बढ़ाने के लिए एक दूसरे प्रोत्साहन पैकेज की आवश्यकता है। तीसरा, यह राष्ट्रीय और राज्य, दोनों राजमार्गों को वैश्विक मानक के आधार पर उन्नत बनाने, जहां जरूरी हो वहां फ्लाई ओवर बनाने, शहरी परिवहन व्यवस्था का विस्तार करने और हमारे शैक्षणिक संस्थानों के बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में सुधार करने का अवसर है। नए हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों के उन्नयन सहित अन्य बुनियादी ढांचा
परियोजनाओं की भी शुरुआत की जा सकती है।

बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं पर खर्च किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे विकास को प्रोत्साहन मिलेगा। चौथा, निर्यात हमारे विकास के लिए महत्वपूर्ण है और भारी रोजगार पैदा करता है, क्योंकि इसका करीब 40 फीसदी लघु उद्योग क्षेत्र में है। दुर्भाग्य से यह क्षेत्र ठहराव का शिकार है और इसे ऊपर नहीं उठाया गया है। कुछ हद तक इसका कारण वैश्विक मांग में कमी है। विश्व व्यापार संगठन के मुताबिक, मौजूदा वर्ष में विश्व व्यापार की मात्रा 12.4 फीसदी घटकर 31.9 फीसदी रहेगी। जबकि विश्व बैंक ने 13.4 फीसदी गिरावट का अनुमान लगाया है। इस साल भारत से निर्यात भी घटा है और आयात भी। अप्रैल-अगस्त की अवधि में निर्यात 26.65 प्रतिशत घटकर 97.66 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 43.73 प्रतिशत गिरकर 118.38 अरब डॉलर हो गया।

कुल व्यापार की मात्रा लगभग 35 फीसदी कम हो सकती है। इस क्षेत्र में कोशिश की जानी चाहिए, ताकि यह क्षेत्र रोजगार को पुनर्जीवित कर सके। पांचवां, 2021-22 में कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, जिस दौरान लोकप्रियतावादी घोषणाओं की होड़ मच सकती है। जबकि इस समय हमारा ध्यान अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने पर होना चाहिए और इस पर राजनीतिक सहमति की आवश्यकता होगी। पिछले दो दशकों में भारत ने बेहतर विकास किया है। आवश्यकता अर्थव्यवस्था के संकुचन को उलटने तथा आने वाले वर्षों में टिकाऊ आधार पर उच्च विकास के स्तर पर पहुंचने के लिए योजना बनाने की है।

-लेखक पूर्व कैबिनेट सचिव एवं योजना आयोग के सदस्य रहे हैं।
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