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66 साल में कैसे 'महाराजा' से फटेहाल हुआ हमारा एयर इंडिया

anant paliwal बिजनेस डेस्क, अमर उजाला Published by: paliwal पालीवाल
Updated Sun, 29 Dec 2019 09:14 AM IST
air india
air india - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स--रोहित झा

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एयर इंडिया पर करीब 58 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। घाटे से बेहाल महाराजा अब फटेहाल हो गए हैं। 1953 में सरकार द्वारा खरीदी गई इस विमानन कंपनी को 66 साल हो गए हैं। हालांकि अब स्थिति ऐसी हो गई है, कि कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों को भी समय पर वेतन नहीं मिल रहा है। ऐसे में पायलटों सहित केबिन क्रू और इंजीनियरिंग स्टाफ ने भी नौकरी से इस्तीफा देने की धमकी दी है। 
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1932 में टाटा एयरलाइंस से हुई थी शुरुआत

एयर इंडिया को सबसे पहले जेआरडी टाटा ने 1932 में टाटा एयरलाइंस के नाम से लॉन्च किया था। 1946 में इसका नाम बदल कर के एयर इंडिया कर दिया गया और 1953 में सरकार ने इसको टाटा से खरीद लिया था। तब से लेकर के सन 2000 तक यह सरकारी एयरलाइन मुनाफे में चलती रही। 2001 में सबसे पहले कंपनी को 57 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। तब विमानन मंत्रालय ने तत्कालीन प्रबंध निदेशक माइकल मास्केयरनहास को दोषी मानते हुए पद से हटा दिया था। 

2007 में विलय के बाद शुरू हुए बुरे दिन

2007 में तब केंद्र सरकार ने एयर इंडिया में इंडियन एयरलाइंस का विलय किया था। दोनों कंपनियों का विलय के वक्त संयुक्त घाटा 770 करोड़ रुपये था, जो विलय के बाद बढ़कर के 7200 करोड़ रुपये हो गया। सरकार ने एसबीआई को रिकवरी के लिए अधिकृत किया था। एयर इंडिया ने घाटे की भरपाई के लिए अपने तीन एयरबस 300 और एक बोइंग 747-300 को 2009 में बेच दिया था। इसके बाद मार्च 2011 में कंपनी का कर्ज बढ़कर के 42600 करोड़ रुपये और परिचालन घाटा 22000 करोड़ रुपये का हुआ था। 

फिलहाल 58 हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज

करीब 58 हजार करोड़ के कर्ज में दबी एयर इंडिया को वित्त वर्ष 2018-19 में 8,400 करोड़ रुपये का जबरदस्त घाटा हुआ है। एयर इंडिया को ज्यादा ऑपरेटिंग कॉस्ट और विदेशी मुद्रा में घाटे के चलते भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। इन हालातों में एयर इंडिया तेल कंपनियों को ईंधन का बकाया नहीं दे पा रही है।  हाल ही में तेल कंपनियों ने ईंधन सप्लाई रोकने की भी धमकी दी थी। लेकिन फिर सरकार के हस्तक्षेप से ईंधन की सप्लाई को दोबारा शुरू कर दिया गया था। केंद्र सरकार,  एयर इंडिया में अपनी 100 फीसदी हिस्सेदारी को बेचने जा रही है।

पहले से है इतना घाटा 

तीन सालों के दौरान एयर इंडिया का घाटा सबसे शीर्ष पर रहा। कंपनी की नेटवर्थ माइनस में 24,893 करोड़ रुपये रही, वहीं नुकसान 53,914 करोड़ रुपये का रहा। भारी उद्योग मंत्री अरविंद गणपत सावंत ने कहा कि पीएसयू विभाग ने रिवाइवल और रिस्ट्रक्चरिंग पर जोर दिया है। सरकार अपनी तरफ से ऐसी कंपनियों में फिर से पैसा कमाने के नए तरीकों पर काम कर रही है।

मांगा 2400 करोड़ रुपये का उधार

लगातार विनिवेश की कोशिश में नाकाम एकमात्र सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया अपना खर्च चलाने को 2,400 करोड़ रुपये कर्ज लेने की तैयारी में है। राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) से कर्ज लेने के लिए सरकार से अनुमति मांगी है।  एनएसएसएफ से कर्ज लेना सरकार से उधारी की तरह होता है, जो वाणिज्यिक बैंकों की अपेक्षा 0.5 फीसदी सस्ता पड़ता है। रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया को तेज करने के लिए फिलहाल कंपनी की विस्तार योजनाओं को रोक दिया गया है। इस दौरान न तो कोई नया एयरक्राफ्ट लीज पर लिया जाएगा और न ही कंपनी के नेटवर्क में विस्तार पर काम होगा। हालांकि, एयर इंडिया जमीन पर खड़े अपने कुछ एयरक्राफ्ट को वापस उड़ान के लिए तैयार कर सकता है।

प्रति माह वेतन पर खर्च होते हैं 300 करोड़ रुपये 

बता दें कि एयर इंडिया को एक महीने में 300 करोड़ रुपये कर्मचारियों को वेतन के रूप में देने होते हैं। इतना ही नहीं, मई माह में भी एयर इंडिया के कर्मचारियों को वेतन 10 दिनों की देरी से मिला था। 

दरअसल इस वित्त वर्ष एयर इंडिया 9,000 करोड़ रुपये के कर्ज का भुगतान करने पर काम कर रही है। इसके लिए कंपनी ने सरकार से मदद मांगी है। हालांकि उसके स्वीकार होने की संभावना कम है। 

निवेशकों को मिलेंगे यह फायदे

अगर कोई निवेशक इस विमानन कंपनी को खरीदता है तो उसे बना बनाया बाजार मिलेगा। साथ ही उसे घरेलू स्तर पर उड़ान के लिए जरूरतों की पूर्ति भी आसानी से पूरी हो जाएगी। 118 एयरक्राफ्ट के साथ एयर इंडिया का बेड़ा इंडिगो के बाद दूसरे नंबर पर है। एयर इंडिया निवेशकों को मौका दे रही है कि वो इसे दुनिया के सबसे बड़े बाजार के रुप में विस्तार दे पाए।
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