चिंता मनी -21 : क्या किस्तों में हो सकता है प्रीमियम का भुगतान ?

नारायण कृष्णमूर्ति, आर्थिक सलाहकार Updated Thu, 03 Sep 2020 01:27 AM IST
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रुपये - फोटो : pixabay

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सैंतालीस साल के श्याम सुंदर मीणा मथुरा में एक वकील के साथ क्लर्क के रूप में काम करते हैं, लेकिन इस साल अप्रैल से वेतन न मिलने के कारण बड़ी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। अपनी पहले की बचत से वह पिछले कुछ महीनों से घर की जरूरतें पूरी कर रहे हैं, लेकिन कुछ जरूरी चीजें प्रभावित हुई हैं, जिनमें उनकी दो जीवन बीमा पॉलिसी के प्रीमियम भी शामिल हैं। वह जानना चाहते हैं कि क्या बीमा प्रीमियम किस्तों में जमा किया जा सकता है और यदि पॉलिसी खारिज हो गई, तो क्या होगा?
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जीवन बीमा पॉलिसी प्रीमियम के मासिक, तिमाही, छमाही और वार्षिक भुगतान की पेशकश करती हैं। पॉलिसीधारक की सुविधा के अनुसार बीमा कंपनियां प्रीमियम के भुगतान की आवृत्तियां तय करती हैं। बदलती परिस्थितियों को देखकर पॉलिसीधारक प्रीमियम के भुगतान की आवृत्ति मासिक से वार्षिक या छमाही के रूप में बदल सकते हैं। इसी तरह से वार्षिक भुगतान को मासिक या छमाही किस्तों में बदला जा सकता है।
मगर आवृत्ति बदलने की मामूली लागत होती है, खासतौर से वार्षिक प्रीमियम को मासिक किस्तों में बदलने पर। उदाहरण के लिए, यदि बीमा का वार्षिक प्रीमियम 1200 रुपये हो, तो इसे मासिक किस्तों में बदलने पर किस्तें सौ रुपये से कुछ अधिक हो सकती हैं, इस तरह बीमाधारक को एक वर्ष में 1200 रुपये से कुछ अधिक राशि देनी होगी।
कैसे दोबारा शुरू हो पॉलिसी
यदि कोई पॉलिसी परिपक्वता अवधि से पहले प्रीमियम न अदा करने के कारण बंद हो गई हो, तो उसे दोबारा शुरू करने के लिए यह देखना होगा कि यह कितने अवधि की थी और कितने वर्षों तक प्रीमियम जमा किया गया।

कोई भी पॉलिसी तब लेप्स होती है, जब पॉलिसीधारक नियत तिथि, यहां तक कि ग्रेस पीरियड में भी प्रीमियम का भुगतान करने में अक्षम हो। बीमा कंपनियां प्रायः नियत तिथि के बाद करीब एक महीना का ग्रेस पीरियड देती हैं, जिसमें प्रीमियम का भुगतान करने पर भी उस अवधि में बीमा कवर मिलता है।

कुछ निवेशोन्मुख पॉलिसी, मसलन यूलिप तब लेप्स हो जाती है, जब नियत समय में प्रीमियम का भुगतान न करने की वजह से कैश सरेंडर वैल्यू (परिपक्वता से पहले पॉलिसी खत्म करने की स्थिति में बीमा कंपनियों द्वारा बीमा धारक को दी जाने वाली राशि) खत्म हो जाए। इसका मतलब है कि बीमाधारक की मृत्यु पर नॉमिनी को कोई कवर नहीं मिलेगा।

अधिकांश जीवन बीमा कंपनियां पॉलिसीधारकों को एक से दो वर्ष की रिवाइवल अवधि यानी पॉलिसी को दोबारा शुरू करने का अवसर देती हैं। ऐसी भी पॉलिसी हैं, जिनमें प्रथम अनपेड प्रीमियम के बाद पांच वर्ष तक की अवधि के बाद उन्हें दोबारा शुरू किया जा सकता है।

हां, रिवाइवल की प्रक्रिया में यह देखने के लिए बीमाधारक के स्वास्थ्य का परीक्षण किया जा सकता है कि वह पॉलिसी को जारी रखने के लिए सेहतमंद है या नहीं। स्वास्थ्य की स्थिति को देखकर प्रीमियम में बढ़ोतरी भी की जा सकती है। इसका मतलब है कि किसी लेप्स पॉलिसी को दोबारा शुरू करने की कीमत होती है, जिसमें अनपेड प्रीमियम, विलंब शुल्क और पेनाल्टी इत्यादि।

श्याम सुंदर मीणा को चाहिए कि वह बीमा कंपनी से बात कर प्रीमियम के भुगतान की अवधि में अपनी सुविधा के अनुसार बदलाव लाएं, बजाय इसके कि उसे लेप्स होने दें। टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी के प्रीमियम के भुगतान में उन्हें देर नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इसकी लागत कम होती है और कई बार बीमा कंपनियां लेप्स होने के बाद इन्हें आसानी से दोबारा शुरू नहीं करतीं।

इसके बावजूद यदि पॉलिसी के भुगतान में उन्हें मुश्किल आ रही है, तो उन्हें किसी एक पॉलिसी को सरेंडर कर देना चाहिए और उससे प्राप्त राशि से दूसरी पॉलिसी के प्रीमियम का भुगतान करना चाहिए। ऐसा कदम उठाते हुए उन्हें अपनी सारी पॉलिसी के बीमा कवर का ठीक से आकलन करना चाहिए।

बेशक थोड़ी मुश्किल ही सही, जीवन बीमा पॉलिसी पर प्रीमियम भुगतान के साथ कभी समझौता न करें, क्योंकि आपकी अनुपस्थिति में, यह वित्तीय सहायता है, जिसकी आपके परिवार के सदस्यों को सबसे ज्यादा जरूरत होगी।
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