वर्ड ऑफ ईयर "संविधान"  संसदीय सियासत का शोर और जनता से दूर

Ajay Khemariyaअजय खेमरिया Updated Tue, 11 Feb 2020 07:07 AM IST
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ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने "संविधान"शब्द को हिंदी वर्ड ऑफ ईयर 2019 घोषित किया है।
ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने "संविधान"शब्द को हिंदी वर्ड ऑफ ईयर 2019 घोषित किया है। - फोटो : self

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ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने "संविधान"शब्द को हिंदी वर्ड ऑफ ईयर 2019 घोषित किया है। भारत में बीते वर्ष यह शब्द संसद, सुप्रीम कोर्ट और सड़क पर सर्वाधिक प्रचलित औऱ प्रतिध्वनित हुआ है।ऑक्सफोर्ड शब्दकोश हर साल इस तरह के भाषीय शब्दों को उस वर्ष का शब्द घोषित करता है।
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भारत के संदर्भ में इस शब्द की उपयोगिता महज  डिक्शनरी तक सीमित नही है। असल में संविधान आज भारत  की संसदीय राजनीति और  चुनावी गणित का सबसे सरल  शब्द भी बन गया है। हजारों लोग संविधान की किताब लेकर  सड़कों, विश्वविद्यालय, और दूसरे संस्थानों में आंदोलन करते हुए नजर आ रहे हैं।
दिल्ली के शाहीनबाग धरने में संविधान की किताबें सैंकड़ो हाथों में दिखाई दे रही है। संविधान जैसा विशुद्ध तकनीकी और मानक शब्द भारत में प्रायः हर सरकार विरोधी व्यक्ति की जुंबा पर है। उधर सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या, तीन तलाक और 370 जैसे मामलों की सुनवाई भी संविधान के आलोक में की इसलिए वहां भी बीते साल यह शब्द तुलनात्मक रूप से अधिक प्रचलन में आया। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने इसी बहुउपयोगिता के आधार पर संविधान को 2019 का वार्षिक हिंदी शब्द घोषित किया है।
सवाल यह कि क्या वाकई भारत के लोकजीवन में संविधान और उसके प्रावधान (जिन्हें मानक शब्दावली में अनुच्छेद, भाग,अनुसूची कहा जाता है) आम प्रचलन में है? 130 करोड़ भारतीय जिस संविधान के अधीन हैं, क्या वे संवैधानिक उपबन्धों से परिचित है? हकीकत यह है  जिस संविधान शब्द की गूंज संचार माध्यमों में सुनाई दे रही है वह चुनावी राजनीति का शोर है।

हमें यह समझने की आवश्यकता भी है कि हाथों में संविधान की किताब उठाए भीड़ और उसके नेतृत्वकर्ता असल में संविधान के आधारभूत  ढांचे से कितने परिचित हैं?

 
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