राम मंदिर निर्माण और असली-नकली शंकराचार्यों का विवाद

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Sun, 09 Feb 2020 08:31 AM IST
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बदरीनाथ धाम में प्रवचन करते शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज।
बदरीनाथ धाम में प्रवचन करते शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज। - फोटो : Amar Ujala

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अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के सर्वसम्मत ऐतिहासिक फैसले के अनुपालन में केन्द्र सरकार ने वैधानिक प्रक्रिया शुरू करते हुए मंदिर निर्माण के लिए उच्चाधिकार प्राप्त ट्रस्ट का गठन तो कर लिया, मगर विवाद है कि अब भी इस मुद्दे का दामन छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
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ताजा विवादों में नृत्य गोपालदास जैसे रामानन्दी या वैष्णवपन्थी सन्तों की उपेक्षा तो शामिल है ही, लेकिन एक नया विवाद वैदिक परम्परानुसार अयोध्या के धर्म क्षेत्र को लेकर खड़ा हो गया है। ‘‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट’’ में स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती को ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में शामिल किए जाने के बाद इस मामले में असली और नकली शंकराचार्यों का विवाद एक बार फिर सतह पर आ गया है।
इस विवाद का असर आगामी हरिद्वार महाकुंभ पर भी पड़ सकता है, क्योंकि वर्तमान में कम से कम 70 सन्यासी स्वयं को शंकराचार्य घोषित कर चुके हैं, जबकि वैदिक और आदि गुरु की परम्परानुसार देश की चार सर्वोच्च पीठों के चार से अधिक शंकराचार्य नहीं हो सकते और वर्तमान में तो चार पीठों के दो ही पीठाधीश्वर सर्वमान्य हैं।
अयोध्या की वैदिक धर्म सीमा को लेकर विवाद
केन्द्र सरकार द्वारा घोषित ‘‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट’’ में शारदा और ज्योेतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती को शामिल न किए जाने से शंकराचार्य का नाराज होना तो स्वाभाविक ही था लेकिन उनकी सबसे बड़ी नाराजगी इस ट्रस्ट में स्वामी वासुदेवानन्द को ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में शामिल किए जाने को लेकर है।

स्वरूपानंद सरस्वती का कहना है कि ‘‘सुप्रीम कोर्ट ने अपने चार फैसलों में वासुदेवानंद सरस्वती को न तो शंकराचार्य माना और न ही संन्यासी ही माना है। यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की स्पष्ट अवहेलना प्रधानमंत्री मोदी एवं संघ द्वारा की गई है।’’

स्वामी स्वरूपानन्द के अनुसार ‘‘अयोध्या क्षेत्र ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य की धर्म सीमा के अन्तर्गत आता है और उस पीठ के शंकराचार्य वह स्वयं हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी एवं संघ ने ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में वासुदेवानंद सरस्वती को ट्रस्ट में जगह देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना की है।’’

वर्ष 1973 से बद्रीनाथ धाम का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने आरोप लगाया था कि स्वामी वासुदेवानंद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अपना दावा पेश करते रहे हैं और वह एक दंडी संन्यासी होने के पात्र नहीं हैं, क्योंकि वह नौकरी में रहे हैं और 1989 से वेतन लेते रहे हैं।
 
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