फिल्म छिछोरे: समाज की मानसिकता में कब तय होगा असफलता का मानक?

Bhawna Masiwalभावना मासीवाल Updated Mon, 16 Sep 2019 09:02 AM IST
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‘छिछोरे’ फिल्म अपने नाम के विपरीत, सफलता और असफलता की कहानी है।
‘छिछोरे’ फिल्म अपने नाम के विपरीत, सफलता और असफलता की कहानी है। - फोटो : file photo

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‘छिछोरे’ नाम थोड़ा सा अजीबो-गरीब है। अजीबो-गरीब इसलिए कि किसी को भी बताओ कि आज ‘छिछोरे’ फिल्म देखी है। नाम सुनते ही कई लोग सिर से पांव तक देखने लगते हैं और मुंह बना लेते हैं। क्योंकि आम जिंदगी में ‘छिछोरे’ शब्द नकारात्मक व्यक्तित्व का सूचक है। मगर ‘छिछोरे’ फिल्म अपने नाम के विपरीत, सफलता और असफलता की कहानी है।
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सफलता और असफलता पर बहुत-सी फ़िल्में बनी हैं जिनमें अब तक सबसे करीबी ‘थ्री इडियट’ थी जिसने बताया कि किताबों से अधिक ज्ञान हमारे आसपास है। उसे अर्जित करोगे तो सफलता झक मारकर पीछे आएगी। ‘छिछोरे’ फिल्म भी इसी कड़ी में सफलता, असफलता और संघर्ष को खूबसूरती के साथ जीने की कहानी है। बेहद सधी हुई, मनोरंजन से परिपूर्ण, भावों को झकझोरती, हंसती कभी रुलाती और गुदगुदाते हुए जीवन का अर्थ समझा जाती है।
अभी हाल ही हमने बढ़ती आत्महत्याओं को रोकने के लिए 10 सितंबर को ‘वर्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे’ मनाया है। जिसका उद्देश्य लोगों को जागरुक करना, मानसिक और भावात्मक रूप से टूट चुके लोगों की मदद करना है। इसके साथ ही बढ़ती आत्महत्याओं की घटनाओं के लिए ‘आत्महत्या रोकथाम रणनीति’ बनाये जाने पर विचार किया जाना है। आत्महत्या के सबसे अधिक मामले भारत में सामने आते हैं। भारत में क्या वयस्क , क्या स्कूली छात्र सभी आत्महत्या करते देखे जाते हैं।
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