बजट में पर्यावरण की उपेक्षा: प्रदूषण से निपटने के लिए काफी नहीं है 4 हजार करोड़ रुपए

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Sat, 01 Feb 2020 05:19 PM IST
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बजट में प्रदूषण और पर्यावरण को लेकर पर्याप्त बजट नहीं।
बजट में प्रदूषण और पर्यावरण को लेकर पर्याप्त बजट नहीं। - फोटो : pti

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विकास दर में निरन्तर गिरावट, आर्थिक मन्दी एवं कर संग्रह में गिरावट जैसी चुनौतियों के बावजूद केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2020-21के वार्षिक बजट में सन्तुलन बनाने का भरसक प्रयास किया है। उन्होंने इस बजट में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार पर फोकस करने के साथ ही मध्य वर्ग को भी आयकर छूट देकर खुश करने का प्रयास किया है।
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इसी तरह संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र के लिए भी 15 लाख तक ऋण वितरण का लक्ष्य तय कर दरियादिली दिखाई गई है। यही नहीं समय के साथ कदमताल करने के लिए ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ने का संकेत दिया है। लेकिन इस बजट में पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के लिए निर्धारित रकम को देख कर लगता है कि सरकार की प्राथमिकताओं में बेजुबान वन्यजीव, प्राणवायु देने वाले वन और वनवासी नहीं रह गए हैं।
इसी तरह हिमालयी राज्यों के लिए भी अलग से कुछ नजर नहीं आता है। जबकि ये सभी राज्य कम से कम ग्रीन बोनस की अपेक्षा तो केन्द्र सरकार से कर ही रहे थे।
पर्यावरण का बजट ऊंट के मंह में जीरा
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की खाता बही से पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्र के लिए केवल 4400 करोड़ की बहुत ही नाकाफीरकम निकल पाई। पिछले बजट में तो यह राशि मात्र 3111.20 करोड़ ही थी। उससे पहले 2017-18 में तो वन एवं पर्यावरण के हिस्से में केवल 2586.67 करोड़ ही आए थे।

दरअसल, यह राशि देश के 7,71821 वर्ग किमी रिकार्डेड वन क्षेत्र के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए ही नहीं बल्कि प्रदूषित शहरों की दूषित हवा को साफ करने के लिए भी है।

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में यह भी कहा है कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले उन शहरों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जहां प्रदूषण की ज्यादा समस्या है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले 53 शहर हैं और ये सभी प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं।

इनमें से दिल्ली, कोलकाता और बम्बई ऐसे शहर हैं निकी जनसंख्या 1 करोड़ से अधिक है। अगर देश के सारे वन क्षेत्र के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ ही प्रदूषित शहरों में स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए सरकार के पास इतनी ही राशि है तो यह ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर ही है। लगता है कि भारत सरकार ने अमेजन एवं आस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग से हुए वन्य संसार के महाविनाश से भी कोई सबक नहीं लिया। भारत में कमोवेश स्थिति भिन्न नहीं है।
 
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