भीष्म साहनी की कहानियों के बाल चरित्र

Bhawna Masiwalभावना मासीवाल Updated Sun, 29 Dec 2019 12:37 PM IST
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भीष्म साहनी की कहानियां अपने समय के जीवन व समाज की मानसिकता को उजागर करती हैं।
भीष्म साहनी की कहानियां अपने समय के जीवन व समाज की मानसिकता को उजागर करती हैं। - फोटो : अमर उजाला

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भीष्म साहनी की कहानियां अपने समय के जीवन व समाज की मानसिकता को उजागर करती हैं। यह मानसिकता एक ओर विभाजन की त्रासदी से बिखरे हुए भारतीय परिवेश को समझने की रही तो दूसरी ओर उससे उत्पन्न तनाव और मानसिक द्वंद्व को सामने लाने की। क्योंकि विभाजन ने केवल दो सीमाओं को ही नहीं बांटा था। बल्कि उसने इंसानियत को भी हिंदू और मुस्लिम दो अपरिचित चेहरों में तब्दील कर दिया था। इसकी छाप केवल विभाजन से पीड़ित लोगों पर नहीं देखी गई बल्कि बच्चों पर अधिक गहरी रही। भीष्म साहनी की कहानियों में बच्चे मनोवैज्ञानिक तौर पर अपने परिवेश व समाज की वास्तविकता का बोध कराते हैं। वास्तविकता का संदर्भ धर्म की सामाजिक रूढ़ मान्यताओं से रहा है, धर्म को जिसने संकीर्ण परिभाषा में बांधा।
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पहला पाठ कहानी का पात्र देवव्रत है जिसके संदर्भ में भीष्म साहनी कथावाचक की शुरूआती भूमिका में बताते हैं।’ब्रह्मचारी देवव्रत की शिक्षा-दीक्षा पुस्तकों द्वारा कम और चांटो से अधिक हुई थी। यो तो शायद सभी लोग जिंदगी के सबक चांटो द्वारा ही सीखते हैं, पुस्तकों और ज्ञान गोष्ठियों द्वारा कम, वह न केवल उसके मस्तिष्क में ही बल्कि उसकी आत्मा पर भी अमिट छाप छोड़ गई’। आगे वह लिखते हैं कि उसकी सबसे ’पहली शिक्षा उसे हिंदुत्व प्रेम की मिली, उस समय वह केवल आठ-नौ वर्ष का तरुण बालक था और अपने शहर के पास एक गुरुकुल का विद्यार्थी था’।
 
बालमन अपनी चंचलताओं और सवालों के लिए जाना जाता है। जिज्ञासा का भाव जिसमें बहुत गहरे से भरा होता है। यह जिज्ञासा उसके स्वयं को लेकर भी हो सकती है और दूसरों को लेकर भी। जैसा कि गुरुकुल में शिक्षा के दौरान वानप्रस्थीजी अछूतोंद्धार विषय पर व्याख्यान देते हैं और मैजिक लैटर्न पर चित्रों का प्रयोग करते हैं। देवव्रत मन्त्र-मुग्ध उन चित्रों को देख रहा था और जब वानप्रस्थजी उसमें अछूतों के बारे में बताते है कि इन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी पीने का अधिकार नहीं था। गांव के कुओं पर उनकी छाया भी नहीं पड़ सकती। तब देवव्रत का यह सोचना कि ’तो फिर यह पानी कहां से पीते हैं? क्या वह बूढ़ा पानी नहीं पीता, इसीलिए इसकी हड्डियां निकल आई हैं’। वानप्रस्थीजी आगे बढ़ते हुए कुंए की बगल में खड़े चितकबरे कुत्ते को दिखाकर बताते हैं; मगर इन्हें पानी-पीने का अधिकार है। मगर देवव्रत अब भी उसी बूढ़े को देख रहा था। उसके बालमन में बहुत से सवाल उठ रहे थे। ’अछूत कौन होते हैं? क्या सब बूढ़े, फटे कपड़े वाले अछूत होते हैं? अछूतों को पानी क्यों नहीं मिलता ?.. देवव्रत ने कभी अछूत नहीं देखा था।
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