पेट्रोलियम उत्पादन पर कोरोना का कोप: मई से हर दिन एक करोड़ बैरल तेल कम निकाला जाएगा

Rajesh Badalराजेश बादल Updated Thu, 16 Apr 2020 04:20 PM IST
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यह पहली बार हुआ है कि रूस और अमेरिका के साथ साथ ओपेक से बाहर के तमाम देश भी एक प्लेटफॉर्म आकर खड़े हुए और तेल के दाम तय करने में अपनी भूमिका निभाई।
यह पहली बार हुआ है कि रूस और अमेरिका के साथ साथ ओपेक से बाहर के तमाम देश भी एक प्लेटफॉर्म आकर खड़े हुए और तेल के दाम तय करने में अपनी भूमिका निभाई।

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दुनिया भर में कोरोना के कोहराम के शोर में एक बड़ी खबर विश्लेषण के नजरिए से हाशिए पर चली गई। चंद रोज पहले तेल उत्पादक देशों के दोनों केंद्रों में समझौता हो गया। ओपेक और ओपेक प्लस मुल्क अब एक ही सुर में बोल रहे हैं। सबकी चिंता कच्चे तेल के दामों में 18 साल में आई सबसे बड़ी गिरावट थी। उसके बाद कोरोना ने कहर बरपाया और तेल का उपयोग घटकर एक तिहाई ही रह गया। इस कारण तेल की कीमतें लुढ़ककर 23 डॉलर प्रति बैरल पर जा पहुंची। 
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इन दिनों कमोबेश हर देश की अपनी अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई हुई है। यह स्थिति सभी उत्पादकों की चिंता बढ़ाने वाली है। इसे देखते हुए अब तक अनेक बार अलग अलग ध्रुवों पर खड़े रहे देश भी एक ही सिरे पर एकत्रित हो गए। जबतक दाम नहीं बढ़ेंगे, तबतक तेल-देशों की माली हालत नहीं सुधरेगी। इसलिए फॉर्मूला यही निकाला गया कि तेल का उत्पादन 10 फीसदी कम किया जाए। इससे मांग बढ़ेगी और उत्पादक देशों को दाम बढ़ाने का अवसर भी मिलेगा।
असल में इस फैसले ने दुनिया के कारोबारी रिश्ते भी नए सिरे से गढ़ने की नींव डाल दी है। अब तक ओपेक याने आर्गेनाईजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज और ओपेक प्लस देश ही मिलकर तेल उत्पादन की नीतियों का निर्धारण करते थे। ओपेक प्लस श्रेणी में मुख्यतः रूस ही माना जाता रहा है। यह पहली बार हुआ है कि रूस और अमेरिका के साथ साथ ओपेक से बाहर के तमाम देश भी एक प्लेटफॉर्म आकर खड़े हुए और तेल के दाम तय करने में अपनी भूमिका निभाई। अब एक मई से ओपेक रोजाना करीब एक करोड़ बैरल तेल उत्पादन में कमी करेगा। 
अन्य देश जैसे नॉर्वे, ब्राजील, कनाडा और अमेरिका प्रतिदिन 50 लाख बैरल तेल उत्पादन गिराएंगे। समझौता फिलहाल मई-जून के लिए हुआ है। इसके बाद रोज दो मिलियन बैरल तेल कम निकाला जाएगा। समझौते से पहले इस मसले पर सऊदी अरब और रूस के मतभेदों ने गंभीर रूप ले लिया था। इससे दाम और नीचे चले गए। सऊदी अरब अपना प्रभुत्व बरकरार रखना चाहता था। उत्पादन घटाने से बाजार में उसकी हिस्सेदारी कम हो सकती थी। सऊदी इसे लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहता था क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था का यही इकलौता आधार है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और सऊदी अरब को तैयार किया। इसके बाद मेक्सिको रूठ गया। उसे भी उत्पादन घटने से अपने मार्किट शेयर में गिरावट का खतरा था। ट्रंप ने उसे भी मनाया। परदे के पीछे की एक कहानी यह भी है कि अमेरिका में शेल ऑइल का उत्पादन कुटीर उद्योग की तरह है। यदि तेल के दाम नीचे जाते रहे तो अमेरिकी शेल कंपनियों पर तलवार लटक जाएगी। उनके बंद होने से बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो जाएंगे। पहले ही अमेरिका बेरोजगारी के भयावह रूप का सामना कर रहा है। अगर यह समझौता नहीं होता तो डोनाल्ड ट्रम्प के लिए आने वाले चुनाव में खतरे बढ़ जाते।अमेरिका के लिए एक छिपा फायदा यह है कि साल भर में वह तेल उत्पादन का नया चौधरी बन सकता है। 
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